भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 140

१२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ सविता देवताकी अनुमति होनेपर उन्हींकी प्रेरणासे परमात्मामें लगे हुए मनके द्वारा हम यथाशक्ति परमात्मप्राप्तिके हेतुभूत ध्यानकर्मके लिये प्रयत्न करेंगे ॥२॥ युक्तेनेति । यदा तत्त्वाय मनो | 'युक्तेन' इत्यादि । जिस समय योजयन्ननुग्राहकदेवताशक्त्याधा- | तत्त्वज्ञानके लिये मनोनिग्रह करते नेन देहेन्द्रियदार्ढ्यं करोति तदा | हुए अनुग्राहक देवताओके शक्ति- युक्तेन सवित्रा परमात्मनि संयो- | सञ्चारके द्वारा [ सविता ] देह और जितेन मनसा वयं तस्य देवस्य | इन्द्रियोंकी दृढता कर देगा उस सवितुः सवेऽनुज्ञायां सत्यां सुव- | समय युक्त—सविता देवताद्वारा र्गेयाय स्वर्गप्राप्तिहेतुभूताय ध्यान- | परमात्मामें लगाये हुए मनके द्वारा कर्मणे यथासामर्थ्यं प्रयतामहे । | हम उस देवका सव प्राप्त होनेपर परमात्मवचनोऽत्र स्वर्गशब्दः । | अर्थात् उनकी अनुज्ञा मिलनेपर तत्प्रकरणात्तस्यैव सुखरूपत्वात्त- | सुवर्गेय—स्वर्गप्राप्तिके हेतुभूत ध्यान- दंशत्वाच्चेतरस्य सुखस्य । तथा | कर्मके लिये यथाशक्ति प्रयत्न करेंगे। च श्रुतिः—"एतस्यैवानन्दस्या- | यहाँ 'स्वर्ग' शब्द परमात्मवाची है, न्यान्यि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" | क्योंकि परमात्माका ही यहाँ प्रकरण (बृ० उ० ४। ३। ३२) इति॥२॥ | है, वही सुखस्वरूप है तथा अन्य | सब सुख भी उसीके अंश हैं। ऐसी | ही यह श्रुति भी है--"इसी | आनन्दकी सूक्ष्मतर मात्राके आश्रय- | से अन्य सब जीव जीवित रहते | हैं" ॥ २ ॥ युक्त्वायैति पुनरपि सोऽप्येवं | 'युक्त्वाय' इत्यादि मन्त्रसे, फिर करोत्विति प्रार्थना— | भी वह ऐसा करे—ऐसी प्रार्थना | करते हैं—