भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 147

अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ परिपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्माकारं | अन्तःकरणमें ही पूर्णानन्दाद्वितीय मनः समुत्पद्यते, नान्यत्रा- | ब्रह्माकार मन ( मनोवृत्ति ) का उदय शुद्धान्तःकरणे । उक्तं च— | होता है, अन्यत्र अशुद्ध अन्तः- | करणमें नहीं । कहा भी है— “प्राणायामविशुद्धात्मा | “क्योंकि जिसका चित्त यस्मात्पश्यति तत्परम् । | प्राणायामके अभ्याससे शुद्ध हो तस्मान्नातः परं किञ्चि- | गया है वही उस परमात्माका त्प्राणायामादिति श्रुतिः ॥ | साक्षात्कार करता है, इसलिये इस अनेकजन्मंसंसार- | प्राणायामसे बढ़कर कुछ भी नहीं चिते पापसमुच्चये । | है—ऐसी श्रुति है । अनेक जन्मके तत्क्षीणे जायते पुंसां | संसारसे जो पापराशि सञ्चित हो गोविन्दाभिमुखी मतिः॥ | गयी है उसके क्षीण हो जानेपर जन्मान्तरसहस्रेषु | पुरुषोंकी बुद्धि श्रीगोविन्दकी ओर तपोज्ञानसमाधिभिः । | होती है । सहस्रों जन्मोंके अनन्तर नराणां क्षीणपापानां | तप, ज्ञान और समाधिके द्वारा जिनके कृष्णे भक्तिः प्रजायते ॥” | पाप क्षीण हो गये हैं उन पुरुषोंकी तस्मात्प्रथमं यज्ञाद्यनुष्ठानं ततः | श्रीकृष्णचन्द्रमें भक्ति होती है ।” | अतः सबसे पहले यज्ञादिका प्राणायामादि ततः समाधिस्ततो | अनुष्ठान किया जाता है, फिर | प्राणायामादिका, फिर समाधिका और वाक्यार्थज्ञाननिष्पत्तिस्ततः कृत- | उसके पश्चात् महावाक्यके अर्थका | ज्ञान होता है, तथा उससे कृत- कृत्यतेति ॥ ६ ॥ | कृत्यता होती है ॥ ६ ॥ सविताकी अनुज्ञासे लाभ यस्मादननुज्ञातस्य तस्य भोग- | क्योकि [सविता देवताकी] अनुज्ञा | न होनेपर उसकी भोगके हेतुभूत हेतौ कर्मण्येव प्रवृत्तिस्तस्मात्— | कर्ममें ही प्रवृत्ति होती है, इसलिये—

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 147, कुल 276 में से · BharatKosha