श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३८ श्वैताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
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सप्तमस्य तु वर्गस्य सप्तम वर्गके बिन्दुयुक्त चतुर्थ वर्ण (वं)
चतुर्थं बिन्दुसंयुतम् ॥ को स्थापित कर दोनों नेत्रोंको
विश्वमध्यस्थमालोक्य नासिकाके अग्रभागपर स्थापित
नासाग्रे चक्षुषी उभे । करे । इडा (वाम) नाडीद्वारा
इडया पूरयेद्वायुं द्वादशमात्रा-क्रमसे बाह्यवायुको भीतर
बाह्यं द्वादशमात्रकैः ॥ खींचे । फिर पूर्ववत् देदीप्यमान-
ततोऽग्निं पूर्ववद्ध्याये- शिखाओंसे युक्त अग्निका ध्यान करे
त्स्फुरज्जवालावलीयुतम् । और उस अग्निमण्डलमें स्थित
रेफं च बिन्दुसंयुक्तं बिन्दुयुक्त रेफ (रं) का ध्यान करे।
शिखिमण्डलसंस्थितम् ॥ तत्पश्चात् धीरे-धीरे पिङ्गला (दायीं)
ध्यायेद्विरेचयेद्वायुं नाडीसे वायुको निकाल दे । फिर
मन्दं पिङ्गलया पुनः । वह मतिमान् योगी दायें नासारन्ध्रसे
पुनः पिङ्गलयापूर्य पिङ्गला नाडीद्वारा प्राण खींचकर
घ्राणं दक्षिणतः सुधीः ॥ उसे धीरे-धीरे इडा नाडीद्वारा बाहर
तद्वद्विरेचयेद्वायु- निकाले। इस प्रकार गुरुकी बतलायी
मिडया तु शनैः शनैः । हुई विधिसे एकान्तमें तीन-चार वर्ष
त्रिचतुर्वत्सरं चापि या तीन-चार मासतक अभ्यास
त्रिचतुर्मासमेव वा ॥ करे । प्रातःकाल, मध्याह्न तथा
गुणोक्तप्रकारेण सायंकालमें स्नान कर सन्ध्यादि कर्मों-
रहस्येवं समभ्यसेत् । से निवृत्त हो छः-छः प्राणायाम करे
प्रातर्मध्यांदिने सायं तथा नित्यप्रति मध्यरात्रिमें भी
स्नात्वा षट्कृत्व आचरेत्॥ अभ्यास करे । ऐसा करनेसे उसकी
संध्यादिकर्म कृत्वैव नाडीशुद्धि हो जाती है और उसके
मध्यरात्रेऽपि नित्यशः । चिह्न स्पष्ट दीखने लगते हैं।
नाडीशुद्धिमवाप्नोति
तच्चिह्नं दृश्यते पृथक् ॥
१. जितने समयमें हाथ जानुमण्डलके चारों ओर घूम जाय उसे एक मात्रा
कहते हैं।