भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 276 में से

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१ ൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘൘ ओष्ठनासिकयोर्मध्ये | ओष्ठ और नासिकाके मध्यमें, हृदये नाभिमण्डले । | हृदयमें, नाभिमण्डलमें तथा पैरोंके पादाङ्गुष्ठाश्रितः प्राणः | अँगूठोंमें भी रहता हुआ शरीरके सर्वाङ्गेषु च तिष्ठति ॥ | सभी अङ्गोंमें विद्यमान है। नित्यप्रति नित्यं षोडशसंख्याभिः | सोलह प्राणायामोंका अभ्यास करे, प्राणायामं समभ्यसेत् । | इससे मनोवाञ्छित पदार्थ प्राप्त होते मनसा प्रार्थितं याति | हैं और वह योगाभ्यासी समस्त सर्वप्राणजयी भवेत् ॥ | प्राणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है। प्राणायामैर्दहेद्दोषान् | साधकको चाहिये कि प्राणायामद्वारा धारणाभिश्च किल्विषान् । | शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणा- प्रत्याहाराच्च संसर्गान् | से पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे ध्यानेनानीश्वरान्गुणान् ॥ | वैषयिक संसर्गोंका अन्त करे और प्राणायामशतं स्नात्वा | ध्यानसे अनीश्वर गुणोंकी निवृत्ति यः करोति दिने दिने । | करे। जो पुरुष प्रतिदिन स्नान मातापितृगुरुघ्नोऽपि | करके सौ प्राणायाम करता है वह त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति ॥” | यदि माता, पिता या गुरुकी हत्या तदेतदाह प्राणानित्यादिना— | करनेवाला हो तो भी तीन वर्षमें | उस पापसे मुक्त हो जाता है।” | यही बात ‘प्राणान्’ इत्यादि मन्त्रसे | बतलायी जाती है--

प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः ॥ ६ ॥ साधकको चाहिये कि युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोध कर जब प्राणशक्ति (प्राणधारणका सामर्थ्य) क्षीण हो जाय तब