भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

तद्द्वात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः ॥१४॥ जिस प्रकार मृत्तिकासे मलिन हुआ बिम्ब (सोने या चाँदीका टुकड़ा) शोधन किये जानेपर तेजोमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्वका साक्षात्कार कर अद्वितीय, कृतकृत्य और शोकरहित हो जाता है ॥ १४ ॥ यथैवेति । यथैव बिम्बं सौवर्णं | 'यथैव' इत्यादि । जिस प्रकार राजतं वा मृदयोपलिप्तं मृदादिना | सुवर्ण या रजतका पिण्ड पहले | मिट्टीसे भरा हुआ अर्थात् मिट्टी मलिनीकृतं पूर्वं पश्चात्सुधान्तं | आदिसे मलिन हुआ रहनेपर फिर सुधौतमित्यस्मिन्नर्थे सुधान्तमिति | सुधान्त अर्थात् अग्नि आदिसे सुधौत | यानी निर्मल किये जानेपर तेजोमय च्छान्दसम् । अग्न्यादिना विम- | होकर चमकने लगता है—मूलमें लीकृतं तेजोमयं भ्राजते । तद्वा | 'सुधौतम्' के अर्थमें 'सुधान्तम्' यह तदेवात्मतत्त्वं प्रसमीक्ष्य दृष्ट्वैको- | प्रयोग वैदिक है—उसी प्रकार | आत्मतत्त्वका साक्षात्कार करनेपर ऽद्वितीयः कृतार्थो भवते वीत- | जीव अद्वितीय, कृतार्थ और शोक- शोकः । परेषां पाठे तद्वात्सत्तत्त्वं | रहित हो जाता है। अन्य शाखाओं- | में जहाँ 'तद्वात्सत्तत्त्वं प्रसमीक्ष्य देही' प्रसमीक्ष्य देहीति । तत्राप्ययमे- | ऐसा पाठ है । वहाँ भी यही अर्थ वार्थः ॥ १४ ॥ | है ॥ १४ ॥

योगसिद्ध या तत्त्वज्ञकी स्थिति कथं ज्ञात्वा वीतशोको भवति ? | किस प्रकार जानकर जीव इत्याह— | शोकरहित होता है, सो श्रुति बतलाती है—