श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 170, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ परमेश्वरका स्तवन इदानीं तस्यैव सूत्रसृष्टिं प्रति- | अब उसी परमात्माकी हिरण्यगर्भ- पादयन्मन्त्रदृगभिप्रेतं प्रार्थयते— | सृष्टिका प्रतिपादन करती हुई | श्रुति मन्त्रदर्शी ऋषियोंके अभिमत | अर्थके लिये प्रार्थना करती है— यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ ४ ॥ जो रुद्र देवताओंकी उत्पत्ति तथा ऐश्वर्यप्राप्तिका हेतु, जगत्पति और सर्वज्ञ है तथा जिसने पहले हिरण्यगर्भको उत्पन्न किया था, वह हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ ४ ॥ यो देवानामिति । यो देवा- | 'जो देवानाम्' इत्यादि । जो नामिन्द्रादीनां प्रभवहेतुरुद्भव- | देवताओंकी अर्थात् इन्द्रादिकी हेतुश्च । उद्भवो विभूतियोगः । | उत्पत्तिका और उद्भवका हेतु है । विश्वाधिपो विश्वाधिपः पाल- | उद्भव विभूतियोगको कहते हैं । जो | विश्वाधिप—विश्वका स्वामी अर्थात् यिता । महर्षिः—महांश्चासावृषि- | पालन करनेवाला है, महर्षि-महान् श्चेति महर्षिः सर्वज्ञ इत्यर्थः । | ऋषि यानी सर्वज्ञ है, हित-रमणीय हितं रमणीयमत्युज्ज्वलं ज्ञानं | अर्थात् अत्यन्त उज्ज्वल ज्ञान जिसका गर्भोऽन्तःसारो यस्य तं जनया- | गर्भ—अन्तःसार है उस [ हिरण्य- | गर्भ ] की जिसने पहले—सृष्टिके मास पूर्वं सर्गादौ । स नोऽस्मान् | आरम्भमें रचना की थी वह हमें शुभ बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु परम- | बुद्धिसे संयुक्त करे; अर्थात् हम पदं प्राप्नुयामेति ॥ ४ ॥ | परमपद प्राप्त करें ॥ ४ ॥