भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 276 में से

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१५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ अभिपश्य निरीक्षस्व श्रेयसा नि- | दृष्टिपात करो अर्थात् हमें कल्याण- योजयस्वेत्यर्थः ॥ ५ ॥ | पथसे युक्त करो ॥ ५ ॥ किञ्च— | तथा— यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे । शिवां गिरित्र तां कुरु मा हिꣲसीः पुरुषं जगत् ॥ ६ ॥ हे गिरिशन्त ! जीवोंकी ओर फेंकनेके लिये तुम अपने हाथमें जो बाण धारण किये रहते हो, हे गिरित्र ! उसे मङ्गलमय करो, किसी जीव या जगत्की हिंसा मत करो ॥ ६ ॥ यामिषूमिति । यामिषुं गिरि- | 'यामिषुम्' इत्यादि । हे गिरि- शन्त हस्ते बिभर्षि धारयस्यस्तवे | शन्त ! तुम जीवोंकी ओर छोड़नेके लिये जो बाण धारण किये रहते हो, जने क्षेप्तुं शिवां गिरित्र गिरिं | हे गिरित्र ! —पर्वतकी रक्षा करनेके त्रायत इति तां कुरु । मा हिंसीः | कारण भगवान् गिरित्र हैं—उसे शिव ( मङ्गलमय ) करो। हमारे किसी पुरुषमस्मदीयं जगदपि कृत्स्नम् । | पुरुषकी और सारे जगत्की भी हिंसा मत करो। यहाँ इस अभिप्रेत अर्थकी साकारं ब्रह्म प्रदर्शयेत्यभिप्रतमर्थं | प्रार्थना की है कि हमें सम्पूर्ण साकार प्रार्थितवान् ॥ ६ ॥ | ब्रह्मके दर्शन कराओ ॥ ६ ॥ परमात्मतत्त्वके ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति इदानीं तस्यैव कारणात्मना- | अब उस परमात्माकी ही जगत्- वस्थानं दर्शयञ्ज्ञानादमृतत्व- | के कारणरूपसे स्थिति दिखलाती हुई श्रुति ज्ञानसे अमृतत्वकी प्राप्ति माह— | दिखलाती है—

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