श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३ भुवनं सर्वतोऽन्तर्बहिश्च वृत्वा | चाहिये । * वह भूमि अर्थात् संसार- | को सर्वतः—बाहर और भीतरसे व्याप्यात्यतिष्ठदतीत्य भुवनं सम- | व्याप्त करके संसारका भी अतिक्रमण | करके स्थित है। दशाङ्गुल अर्थात् धितिष्ठति। दशाङ्गुलमनन्तमपार- | अनन्त--अपार रूपसे । अथवा मित्यर्थः। अथवा नाभेरुपार दशा- | नाभिसे ऊपर जो दश अङ्गुल | परिमाणवाला हृदय है उसमें स्थित ङ्गुलं हृदयं तत्राधितिष्ठति ॥१४॥ | है॥ १४ ॥ ननु सर्वात्मत्वे सप्रपञ्चं ब्रह्म | किन्तु सर्वात्मक होनेपर तो ब्रह्म | सप्रपञ्च ( सविशेष ) सिद्ध होगा, स्यात्तद्व्यतिरेकेणाभावादित्याह-- | क्योंकि उससे अतिरिक्त प्रपञ्चकी सत्ता | ही नहीं है, इसपर श्रुति कहती है— पुरुष एवेदग्ँ सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥१५॥ जो कुछ भूत और भविष्यत् है एवं जो अन्नके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है वह सब पुरुष ही है; तथा वही अमृतत्व ( मुक्ति ) का भी प्रभु है ॥ १५ ॥ पुरुष एवेदमिति । पुरुष एवेदं | 'पुरुष एवेदम्' इत्यादि । यह | जो अन्नसे बढ़ता है तथा यह जो सर्वं यदन्नेनातिरोहति यदिदं | वर्तमान दिखायी देता है तथा जो दृश्यते वर्तमानं यद्भूतं यच्च भव्यं | कुछ भूत और भविष्यत् है वह सब | पुरुष ही है। इसके सिवा, वह भविष्यत् । किञ्च—उतामृतत्व- | अमृतत्वका ईशान है अर्थात् अमरण-
- अर्थात् सहस्र यानी अनन्त अक्षि ( नेत्र ) और पाद ( चरण ) होनेके कारण वह सहस्राक्ष और सहस्रपाद है।