भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

अध्याय ३ शाङ्करभाष्यार्थ १७१

(बृ० उ० ३।७।२३) इति श्रुतेः। कोई द्रष्टा नहीं है" इस श्रुतिसे सिद्ध तमाहुरग्र्यं प्रथमं सर्वकारणत्वा- होता है। उसे [ऋषियोंने] सबका कारण होनेसे अग्र्य-प्रथम और पुरुष त्पुरुषं पूर्णं महान्तम् ॥१९॥ -पूर्ण एवं महान् कहा है ॥१९॥

आत्मज्ञानसे शोकनिवृत्तिका निरूपण
किञ्च— तथा—
अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः ।
तमक्रतुं पश्यति वीतशोको
धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥
`यह अणुसे भी अणु और महान्से भी महान् आत्मा इस जीवके
अन्तःकरणमें स्थित है। उस विषयभोगसंकल्पशून्य महिमामय आत्माको
जो विधाताकी कृपासे ईश्वररूपसे देखता है वह शोकरहित हो
जाता है ॥२०॥`
अणोरणीयानिति । अणोः | 'अणोरणीयान्' इत्यादि । अणु
सूक्ष्मादप्यणीयानणुतरः । महतो | अर्थात् सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महत्-
महत्त्वपरिमाणान्महीयान्महत्तरः । | [आकाशादि] महत्त्वयुक्त परिमाणों-
से भी महत्तर—ऐसा जो आत्मा है
स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादि- | वह इस जीवके अर्थात् ब्रह्मासे
स्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य | लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी प्राणियोंके
गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः | गुहा—हृदयमें निहित है; अर्थात्
उनका स्वरूपभूत होकर स्थित
-स्थित इत्यर्थः । तमात्मानमक्रतुं | है। जो पुरुष अक्रतु—विषय-
विषयभोगसङ्कल्परहितमात्मनो | भोगके संकल्पसे रहित, अपने ही