भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७७ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ भ्रमरः, पतनाद्गच्छतीति पतङ्गः । भ्रमर है। नीचे गिरते चलनेके कारण हरितो लोहिताक्षः शुकादि- भ्रमरको पतङ्ग कहते हैं। तू ही निकृष्टाः प्राणिनस्त्वमेवेत्यर्थः । हरित लोहिताक्ष है, अर्थात् शुकादि निकृष्ट प्राणिवर्ग भी तू ही है। तू तडिद्गर्भो मेघ ऋतवः समुद्राः । ही तडिद्गर्भ—मेघ, ऋतु एवं समुद्र यस्मात्त्वमेव सर्वस्यात्मभूतस्त- है। इस प्रकार क्योंकि तू ही सब- का आत्मा है इसलिये तू अनादि स्मादनादिस्त्वमेव त्वमेवाद्यन्त- है—तेरा आदि और अन्त नहीं शून्यः, विभुत्वेन व्यापकत्वेन है, जिससे कि विभु अर्थात् व्यापक यतो जातानि भुवनानि विश्वानि होनेके कारण, सम्पूर्ण भुवन उत्पन्न ॥ ४ ॥ हुए हैं ॥ ४ ॥ ❧❧❧ प्रकृति और जीवके सम्बन्धका विचार इदानीं तेजोऽबन्नलक्षणां प्रकृतिं अब छान्दोग्योपनिषद्में प्रसिद्ध तेज, अप् और अन्नरूपा प्रकृतिको छान्दोग्योपनिषत्प्रसिद्धामजारूप- श्रुति अजारूपसे कल्पित करके कल्पनया दर्शयति— दिखलाती है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ अपने अनुरूप बहुत-सी प्रजा उत्पन्न करनेवाली एक लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णा अजा (बकरी—प्रकृति) को एक अज (बकरा—जीव) सेवन करता हुआ भोगता है और दूसरा अज उस भुक्तभोगाको त्याग देता है ॥ ५ ॥