श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 195, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 195
[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थं १८१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भार्या किं मे जीवितेन' इत्येवं दीन- | गयी अब मेरे जीनेसे क्या लाभ है?' |
| इस प्रकारका दीनभाव ही अनीशा | |
| भावोऽनीशा तया शोचति सन्त- | (असमर्थता) है उससे युक्त होकर |
| और मोहग्रस्त होकर यानी अनर्थके | |
| प्यते मुह्यमानोऽनेकानर्थप्रकारै- | अनेकों प्रकारोंसे अविवेकवश विचित्र |
| रविवेकतया विचित्रतामापद्यमानः। | स्थितिको प्राप्त होकर शोक अर्थात् |
| सन्ताप करता है। | |
| स एव प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि- | वही प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि |
| योनिष्वापतन्दुःखमापन्नः कदा- | योनियोंमें पड़कर दुःख भोगता है। |
| जब कभी अनेक जन्मोंके सञ्चित | |
| चिदनेकजन्मशुद्धधर्मसञ्चयन- | पुण्यकर्मविपाकसे कोई परमकृपालु |
| निमित्तं केनचित्परमकारुणिकेन | आचार्य उसे योगमार्गका उपदेश |
| दर्शितयोगमार्गोऽहिंसासत्यब्रह्म- | कर देते हैं तो वह अहिंसा, सत्य, |
| ब्रह्मचर्य एवं सर्वत्यागके द्वारा समा- | |
| चर्यसर्वत्यागसमाहितात्मा सन् | हितचित्त और शमादि साधनोंसे |
| शमादिसम्पन्नो जुष्टं सेवितमनेक- | सम्पन्न हो अनेक योगमार्गोंसे सेवित |
| योगमार्गैर्यदा यस्मिन्काले पश्यति | अन्य यानी वृक्ष (देह) रूप |
| उपाधिसे भिन्न, संसारधर्मशून्य, | |
| ध्यायमानोऽन्यं वृक्षोपाधिलक्षणा- | क्षुधादिसे असंस्पृष्ट, सर्वान्तर्यामी ईश्वर |
| द्विलक्षणमसंसारिणमशनायाद्यसं- | परमात्माका ध्यान करता हुआ उसे |
| देखता है। अर्थात् 'मैं यह हूँ, अर्थात् | |
| स्पृष्टं सर्वान्तरं परमात्मानमीशम् | मैं सबमें समान और समस्त प्राणियोंके |
| 'अयमह मस्मीत्यात्मा सर्वस्य समः | भीतर स्थित आत्मा हूँ, अविद्याजनित |
| सर्वभूतान्तरस्थो नेतरोऽविद्या- | उपाधिसे परिच्छिन्न मायात्मा नहीं |
| हूँ' इस प्रकार साक्षात्कार करता है | |
| जनितोपाधिपरिच्छिन्नो मायात्मा' | और उसकी विभूतिरूप महिमाको |
| इति विभूतिं महिमानमिति जगद्रूप- | देखता है यानी यह जगद्रूप महिमा |