श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ तस्मै हविषा चरुपुरोडाशादि- | को हवि--चरु-पुरोडाशादि द्रव्यसे द्रव्येण विधेम परिचरेम । विधेः | विधेम-पूजें । परिचर्या (पूजा) ही | जिसका कर्म है ऐसे 'विध' धातुका परिचरणकर्मण एतद्रूपम् ॥१३॥ | यह रूप है* ॥१३॥ परमात्मज्ञानसे शान्ति-प्राप्ति एवं बन्धननाशका पुनः उपदेश परस्यातिसूक्ष्मत्वं जगच्चक्रे | यद्यपि परमात्माके अत्यन्त सूक्ष्मत्व, साक्षित्वेनावस्थितत्वं निखिल- | जगच्चक्रमें साक्षीरूपसे स्थित होने, जगत्स्रष्टृत्वं सर्वात्मकत्वं तत्ता- | सम्पूर्ण जगत्को रचने, सर्वरूप होने दात्म्याज्ञानां मुक्तिश्चेत्येत- | एवं उसके तादात्म्य-ज्ञानसे जीवोंकी द्बहुशोऽधस्तात्प्रतिपादितं यद्यपि | मुक्ति होनेका ऊपर अनेक प्रकारसे तथापि बुद्धिसौकर्यार्थं पुनरप्याह- | प्रतिपादन किया जा चुका है, तथापि | यह सब समझनेमें सुगमता हो जाय | -इसलिये श्रुति फिर भी कहती है- सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अविद्या और उसके कार्यरूप दुर्गम स्थानमें स्थित,† जगत्के रचयिता, अनेकरूप और संसारको एकमात्र भोग प्रदान करनेवाले शिवको जानकर जीव परम शान्ति प्राप्त करता है ॥१४॥
- यद्यपि 'विध विधाने' (तुदा० पर० सेट् ) धातुसे विधि लिङ्के उत्तम पुरुषके बहुवचनमें 'विधेम' रूप बनता है। तथापि विधानका तात्पर्य परिचर्या (पूजा) में ही है—ऐसा मान लेनेसे अर्थ ठीक हो जाता है। अथवा 'धातु' के अनेक अर्थ होते हैं इस न्यायसे भी परिचर्या अर्थ ठीक ही है। † 'कलिल' शब्दके अर्थमें टीकाकारोंका मतभेद है। प्रस्तुत अर्थ शाङ्कर- भाष्यके अनुसार है। विज्ञानभगवान्ने भी यही अर्थ किया है। नारायणतीर्थ 'कलिलस्य मध्ये' का अर्थ 'तमसो मध्ये'—'अज्ञानके मध्यमें' करते हैं तथा शङ्करा- नन्दजी इस शब्दकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं— 'नारीवीर्येण संगतं पौरुषं