भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

[अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९३


(बाएँ) परस्यात्यन्तातिसूक्ष्मतमत्वमा- (दाएँ) अब श्रुति परमात्माका अत्यधिक (बाएँ) नन्दातिशयवत्त्वं निर्दोषवत्त्वं (दाएँ) सूक्ष्मतम, अतिशय आनन्दवान् और (बाएँ) जीवेष्वतिसूक्ष्मतया स्वरूपेणा- (दाएँ) निर्दोष होना, जीवोंमें अत्यन्त सूक्ष्म- (बाएँ) वस्थितत्वं सर्वस्यापि सत्तादि- (दाएँ) रूपसे स्थित होना, सबको सत्तास्फूर्ति (बाएँ) प्रदतया व्यापित्वं तदेकत्वज्ञानात् (दाएँ) देनेवाला होनेसे व्यापक होना तथा (बाएँ) पाशहानिं च दर्शयति— (दाएँ) उसके एकत्वज्ञानसे बन्धनका नाश होना दिखलाती है—


घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥

घृतके ऊपर रहनेवाले उसके सार भागके समान अत्यन्त सूक्ष्म शिवको भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित जानकर तथा विश्वके एकमात्र भोगप्रद उस देवका साक्षात्कार कर पुरुष समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१६॥


(बाएँ) घृतादिति । घृतोपरि विद्य- (दाएँ) 'घृतात्' इत्यादि । जिस प्रकार (बाएँ) मानं मण्डं सारस्तद्वतामतिप्रीति- (दाएँ) घृतके ऊपर रहनेवाला मण्ड— (दाएँ) उसका सारभाग घृतवालोंकी अत्यन्त (बाएँ) विषयो यथा तथा मुमुक्षूणामति- (दाएँ) प्रीतिका विषय होता है उसी प्रकार (दाएँ) परमात्मा मुमुक्षुओंको साररूप (बाएँ) साररूपानन्दप्रदत्वेन निरतिशय- (दाएँ) अत्यन्त आनन्द प्रदान करनेके (दाएँ) कारण उनकी निरतिशय प्रीतिका (बाएँ) प्रीतिविषयः परमात्मा तद्वद् (दाएँ) विषय है । उस घृतके सारके समान (बाएँ) घृतसारवदानन्दरूपेणात्यन्तसूक्ष्मं (दाएँ) आनन्दरूपसे अत्यन्त सूक्ष्म शिवको, (दाएँ) 'शिव' शब्दकी व्याख्या पहले की (बाएँ) ज्ञात्वा शिवमित्येतद्व्याख्यातम्। (दाएँ) जा चुकी है, समस्त भूतोंमें—ब्रह्मासे (बाएँ) सर्वभूतेषु गूढं ब्रह्मादिस्तम्ब- (दाएँ) लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त जीवोंमें