भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७

दर्शनेन विहीनस्तु | नहीं होता। जो पुरुष इस दृष्टिसे संसारं प्रतिपद्यते ॥” | रहित है वह संसारको प्राप्त होता “कर्मणा बध्यते जन्तु- | है”, “जीव कर्मसे बँधता है और र्विद्यया च विमुच्यते । | ज्ञानसे मुक्त हो जाता है, इसलिये तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति | पारदर्शी मुनिजन कर्म नहीं करते । यतयः पारदर्शिनः ॥ | स्थिरबुद्धि प्राचीन आचार्योंने ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहु- | ज्ञानको ही मोक्षका साधन बतलाया है, र्वृद्धा निश्चयदर्शिनः । | अतः शुद्ध ज्ञानसे जीव सम्पूर्ण पापोंसे तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन | मुक्त हो जाता है”, “इस प्रकार मुच्यते सर्वपातकैः ॥” | मृत्युको अवश्य होनेवाली जानकर “एवं मृत्युं जायमानं विदित्वा | विद्वान् ज्ञानके द्वारा नित्य तेजः- ज्ञानेन विद्वांस्तेज अभ्येति नित्यम्। | स्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होता है, इसके न विद्यते ह्यन्यथा तस्य पन्था- | सिवा उसके लिये कोई और मार्ग स्तं मत्वा कविरास्ते प्रसन्नः ॥” | नहीं है, उसे जान लेनेपर विद्वान् “क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञाना- | प्रसन्नचित्त हो जाता है”, द्विशुद्धिः परमा मता ।” | “परमात्माके ज्ञानसे जीवकी अत्य- “अयं तु परमो धर्मो | न्तिकी शुद्धि मानी गयी है”, यद्योगेनात्मदर्शनम् ॥” | “योगसाधनके द्वारा आत्माका “आत्मज्ञः शोकसंतीर्णो | साक्षात्कार करना—यही परमधर्म न बिभेति कुतश्चन । | है”, “आत्मज्ञानी शोकसे पार मृत्योः सकाशान्मरणा- | होकर मृत्यु, मरण अथवा किसी दथवान्यकृताद्भयात् ॥” | अन्य कारणसे होनेवाले भय— “न जायते न म्रियते | इनमेंसे किसीसे भी नहीं डरता”, न वध्यो न च घातकः । | “परमात्मा न उत्पन्न होता है, न न बध्यो बन्धकारी वा | मरता है, न मारा जाता है और न न मुक्तो न च मोक्षदः ॥ | मारता है, वह न तो बाँधा जानेवाला पुरुषः परमात्मा तु | है और न बाँधनेवाला है तथा न मुक्त यदतोऽन्यदसच्च तत् ।” | है और न मोक्षप्रद ही है, उससे | भिन्न जो कुछ है वह असत् ही है ।”