श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०१ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ अजात इति । इतिशब्दो | 'अजातः' इत्यादि । मूलमें 'इति' हेत्वर्थः । यस्मात्त्वमेवाजातो ज- | शब्द हेतुवाचक है । क्योंकि तुम्हीं न्मजराशनायापिपासाधर्मवर्जितः । | अजात यानी जन्म, जरा, क्षुधा, इतरत्सर्वं विनाशि दुःखान्वितम्, | पिपासादि धर्मोंसे रहित हो, और सब तस्माज्जन्मजरामरणाशनायापिपा- | तो नाशवान् एवं दुःखी हैं, इसलिये जो साशोकमोहान्वितात्संसाराद्भीरु- | जन्म-जरा-मरण, क्षुधा-पिपासा एवं र्भीतः सन्कश्चिदेक एव परतन्त्र- | शोक-मोहादिपूर्ण संसारसे डरा हुआ है स्त्वामेव शरणं प्रपद्ये मादृशो वा | ऐसा कोई एक मैं परतन्त्र जीव कश्चित्प्रपद्यत इति प्रथमपुरुष- | तुम्हारी ही शरण लेता हूँ; अथवा मन्वधीयते । हे रुद्र यत्ते दक्षिणं | कोई मुझ-जैसा शरण लेता है— मुखमुत्साहजननं ध्यातॄणामाह्लाद- | इस आशयसे इस क्रियाका प्रथम करम् । अथवा दक्षिणस्यां दिशि | पुरुषसे सम्बन्ध किया जा सकता भवं दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि | है । अतः हे रुद्र ! तुम्हारा जो नित्यं सर्वदा ॥२१॥ | उत्साहजनक दक्षिण मुख है, | जो ध्यान करनेपर आनन्द पैदा | करनेवाला है अथवा दक्षिण दिशामें | होनेके कारण जो दक्षिण मुख है | उससे तुम नित्य—सर्वदा मेरी रक्षा | करो ॥२१॥ ———•••——— किञ्च— | तथा— मा नस्तोके तनये मा न आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधी- र्हविष्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥२२॥ हे रुद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वोंमें क्षय न करना और हमारे वीर सेवकोंका भी वध न करना । हम हव्य- सामग्रीसे युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥