भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पञ्चम अध्याय

—-—:00:00:00:—-- अक्षराश्रित विद्या-अविद्या और उनके शासक परमेश्वरके स्वरूप तथा माहात्म्यका वर्णन चतुर्थाध्यायशेषमपूर्वार्थं प्रति- | चतुर्थ अध्यायमें अवशिष्ट रहे अपूर्व विषयका प्रतिपादन करनेके पादयितुं पञ्चमोऽध्याय आर- | लिये 'द्वे अक्षरे' इत्यादि मन्त्रसे पञ्चम अध्याय आरम्भ किया भ्यते द्वे अक्षरे इत्यादिना-- | जाता है-- द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट अविनाशी और अनन्त परब्रह्ममें जहाँ विद्या और अविद्या दोनों परिच्छिन्नभावसे स्थित हैं [ उनमें ] क्षर अविद्या है और अमृत विद्या है तथा जो इन विद्या और अविद्या दोनोंका शासन करता है वह इनसे भिन्न है ॥१॥ द्वे विद्याविद्ये यस्मिन्नक्षरे | जिस अविनाशी एवं अनन्त यानी ब्रह्मणो हिरण्यगर्भात्परे ब्रह्मपरे | देश, काल या वस्तुसे अपरिच्छिन्न ब्रह्म- परस्मिन्वा ब्रह्मण्यनन्ते देशतः | परमें—ब्रह्मा यानी हिरण्यगर्भसे उत्कृष्ट कालतो वस्तुतो वापपरिच्छिन्ने । | अथवा परब्रह्ममें विद्या और अविद्या यत्र यस्मिन्द्वे विद्याविद्ये निहिते | ये दोनों गूढ यानी अव्यक्तभावसे स्थापिते गूढे अनभिव्यक्ते । | स्थित हैं। उन विद्या और अविद्याको विद्याविद्ये विविच्य दर्शयति— | अलग-अलग करके दिखाते हैं—