श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३ वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥ सौ भागोंमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये; किन्तु वही अनन्तरूप हो जाता है ॥ ९ ॥ वालाग्रेति । वालाग्रस्य शत- ‘वालाग्र०’ इत्यादि । सौ भागोंमें विभक्त किये केशके अग्रभागका जो कृत्वो भेदमापादितस्य यो भाग- एक भाग है उसके भी सौ भाग स्तस्यापि शतधा कल्पितस्य किये जानेपर जो भाग होता है उसके समान जीवको समझना भागो जीवः स विज्ञेयः । लिङ्ग- चाहिये । लिङ्गदेह अत्यन्त सूक्ष्म है, इसलिये उसके परिमाणके स्यातिसूक्ष्मत्वात् तत्परिमाणे- अनुसार ही इसका परिमाण बतलाया नायं व्यपदिश्यते । स च जीव- जाता है । जीवस्वरूपसे वह ऐसा है, किन्तु स्वतः (अपने परमार्थरूपसे) स्वरूपेण, आनन्त्याय कल्पते स्वतः ९ वही अनन्त हो जाता है ॥९॥ किञ्च-- । तथा- नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्ष्यते ॥१०॥ यह [ विज्ञानात्मा ] न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ॥१०॥ नैव स्त्रीति । स्वतोऽद्वितीया- ‘नैव स्त्री’ इत्यादि । स्वयं साक्षात् अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण परोक्षब्रह्मात्मस्वभावत्वान्नैव स्त्री यह न स्त्री है, न पुरुष है और न न पुमानेष नैव चायं नपुंसकः । नपुंसक ही है । यह जिस-