भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ रात्मबुद्धिः सैव प्रकाशोऽस्येत्या- | वही जिसका प्रकाश है उस आत्म- त्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै वैशब्दो- | बुद्धिप्रकाशकी मैं मुमुक्षु—यहाँ 'वै' ऽवधारणे मुमुक्षुरेव सन्न फलान्तर- | शब्द निश्चयार्थक है [ अतः तात्पर्य | यह है कि ] मुमुक्षु होकर ही शरण मिच्छञ्छरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ | लेता हूँ, किसी अन्य फलकी इच्छा | करता हुआ नहीं ॥ १८ ॥ ───◇:❖:◇─── एवं तावत्सृष्ट्यादिना यल्ल- | इस प्रकार यहाँतक सृष्टि आदि क्ष्यं स्वरूपं दर्शितम्, अथेदानिं | कार्यसे लक्षित होनेवाले जिस स्वरूप- तत्स्वरूपेण दर्शयति— | का वर्णन किया है उसीको अब | साक्षात्स्वरूपसे प्रदर्शित करते हैं— निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥ जो कलाहीन, क्रियाहीन, शान्त, अनिन्द्य, निर्लेप, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईंधन जल चुका है उस [ धूमादिशून्य ] अग्निके समान [ देदीप्यमान ] है [ उस देवकी मैं शरण लेता हूँ ] ॥१९॥ निष्कलमिति। कला अवयवा | 'निष्कलम्' इत्यादि । जिससे निर्गता यस्मात्तं निष्कलं निर- | कला यानी अवयव निकल गये हैं वयवमित्यर्थः । निष्क्रियं स्वमहि- | उस निष्कल अर्थात् निरवयव, मप्रतिष्ठितं कूटस्थमित्यर्थः । | निष्क्रिय—अपनी महिमामें स्थित शान्तमुपसंहृतसर्वविकारम् । निर- | अर्थात् कूटस्थ, शान्त—जिसके वद्यमगहंणीयम् । निरञ्जनं निर्ले- | सब विकारोंका अन्त हो गया है, पम् । अमृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य | निरवद्य—अनिन्द्य, निरञ्जन—निर्लेप, | अमृत यानी अमृतत्व—मोक्षकी प्राप्ति-