श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत टीका)] अथ स्वानुभवदार्ढ्यानन्तर- मत्याश्रमिभ्यः। "अतिः पूजायाम्" इति स्मरणादत्यन्तं पूज्यत- माश्रमिभ्यः साधनचतुष्टयसम्पत्ति- महिम्ना स्वेषु देहादिष्वपि जीवनभोगादिष्वनास्थावद्भ्यः । अत एव वैराग्यपुष्कलवद्भ्यः । तदुक्तम्— "वैराग्यं पुष्कलं न स्या- न्निष्फलं ब्रह्मदर्शनम् । तस्माद्रक्षेत विरतिं बुधो यत्नेन सर्वदा ॥" इति । स्मृत्यन्तरे च— "यदा मनसि वैराग्यं जायते सर्ववस्तुषु । तदैव संन्यसेद्विद्वा- नन्यथा पतितो भवेत् ॥" इति। परमहंससंन्यासिनस्त एवा- त्याश्रमिणः । तथा च श्रूयते— "न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः परो हि ब्रह्मा । तानि वा एता- न्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्" (म० ना० ७८) इति । "चतुर्विधा भिक्षवश्च बहूदककुटीचकौ ।
[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)] फिर अपना अनुभव दृढ़ करनेके पश्चात् उसे अत्याश्रमियोंको—"अति- शब्द पूजार्थक है" ऐसी स्मृति होनेके कारण अत्यन्त पूजनीय आश्रमवालोंको अर्थात् साधनचतुष्टय- की पूर्णताके प्रभावसे जिनकी अपने शरीरादि तथा जीवन और भोगादिमें भी आस्था नहीं थी उनको, अतः पूर्ण वैराग्यवानोंको [ इसका उपदेश किया ] । ऐसा ही कहा भी है— "यदि पूर्ण वैराग्य न हो तो ब्रह्मज्ञान निष्फल है, अतः बुद्धिमान् पुरुषको सर्वदा प्रयत्नपूर्वक वैराग्यकी रक्षा करनी चाहिये ।" तथा दूसरी स्मृतिमें कहा है—"जिस समय मनमें समस्त वस्तुओंके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाय उसी समय विद्वान्को संन्यास ग्रहण करना चाहिये, नहीं तो उसका पतन हो जायगा।" इस प्रकार जो परमहंस संन्यासी हैं वे ही अत्याश्रमी हैं। ऐसा ही श्रुति भी कहती है—"न्यास ही ब्रह्मा है, ब्रह्मा ही पर ( परब्रह्म ) है, पर ही ब्रह्मा है और ये सब तप निकृष्ट हैं, संन्यास ही सबसे बड़ा है" इत्यादि; तथा "बहूदक, कुटी- चक, हंस और परमहंस—ये चार प्रकारके भिक्षु हैं, इनमें जो-जो