श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
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अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४९ अन्यथा प्रत्यवायापत्तिरिति पुनः- | चाहिये ।* नहीं तो प्रत्यवाय शब्दार्थः । | (पाप) लगता है—यह ‘पुनः’ | शब्दका तात्पर्य है । अत एव ब्रह्मविद्याविवक्षुणा | इसलिये जो गुरु ब्रह्मविद्याका गुरुणा चिरकालं परीक्ष्य शिष्य- | उपदेश करना चाहे उसे बहुत गुणाञ्ज्ञात्वा ब्रह्मविद्या वक्तव्येति | समयतक परीक्षा करके शिष्यके भावः । तथा च श्रुतिः—“भूय | गुणोंको जानकर इसका उपदेश एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | करना चाहिये—ऐसा इसका भाव संवत्सरं संवत्स्यथ” (प्र० उ० | है। ऐसी ही यह श्रुति भी है— १।२) इति । श्रुत्यन्तरे च— | “फिर एक सालतक तपस्या, “एकशतं ह वै वर्षाणि प्रजापतौ | ब्रह्मचर्य और श्रद्धापूर्वक तुम यहाँ मघवान्ब्रह्मचर्यमुवास” (छा० | वास करो।” तथा एक अन्य उ० ८।११।३) इति च। | श्रुतिमें कहा है—“इन्द्रने प्रजापति- एतच्च बहुधा प्रपञ्चितमुपदेश- | के यहाँ एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्य साहस्रिकामित्यत्र संकोचः कृतः | व्रतका पालन करते हुए निवास ॥२२॥ | किया” इत्यादि । इस प्रसंगका | उपदेशसाहस्रीमें अनेक प्रकारसे | विस्तृत वर्णन किया है, इसलिये यहाँ | संक्षेपसे कह दिया है ॥२२॥
परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये उपदेशकी सफलता अत्रापि देवतागुरुभक्तिमता- | अब श्रुति यह दिखलाती है कि | यहाँ भी देवता और गुरुकी भक्ति-
- शिष्य और पुत्रके प्रति ही ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी विधिका रहस्य यही जान पड़ता है कि जिसे उपदेश किया जाय उसकी उपदेशकके प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये और ऐसी श्रद्धा केवल पुत्र या शिष्यकी ही हो सकती है । इसलिये वे ही इसके उपदेशके अधिकारी हैं।