भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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तीर्थाङ्क (सचित्र) [वर्ष ३१, सन् १९५७ ई०]—इस अङ्कमें तीर्थोंकी महिमा, उनका स्वरूप, वर्तमान स्थिति एवं तीर्थ-सेवनके महत्त्वपर उत्कृष्ट मार्ग-दर्शन-अध्ययनका विषय है। इसमें देव-पूजन-विधिसहित, तीर्थोंमें पालन करनेयोग्य तथा त्यागनेयोग्य उपयोगी बातोंका भी उल्लेख है। अतः भारतके प्रायः समस्त तीर्थोंका अनुसंधानात्मक ज्ञान करानेवाला यह एक ऐसा संकलन है जो सभी तीर्थाटन-प्रेमियोंके लिये महत्त्वपूर्ण मार्ग-दर्शक (गाइड) हो सकता है। संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत (सचित्र) [वर्ष ३४, सन् १९६० ई०]—इसमें पराशक्ति भगवतीके स्वरूप-तत्त्व, महिमा आदिके तात्त्विक विवेचनसहित श्रीमद्देवीकी लीला-कथाओंका सरस एवं कल्याणकारी वर्णन है। श्रीमद्देवीभागवतके विविध, विचित्र कथा-प्रसंगोंके रोचक और ज्ञानप्रद उल्लेखके साथ देवी-माहात्म्य, देवी-आराधनाकी विधि एवं उपासनापर इसमें महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है। अतः साधनाकी दृष्टिसे यह अत्यन्त उपादेय और अनुशीलनयोग्य है। संक्षिप्त योगवासिष्ठाङ्क (सचित्र) [वर्ष ३५, सन् १९६१ ई०]—योगवासिष्ठके इस संक्षिप्त रूपान्तरमें जगत्की असत्ता और परमात्मसत्ताका प्रतिपादन है। पुरुषार्थ एवं तत्त्व-ज्ञानके निरूपणके साथ-साथ इसमें शास्त्रोक्त सदाचार, त्याग-वैराग्ययुक्त सत्कर्म और आदर्श व्यवहार आदिपर सूक्ष्म विवेचन है। कल्याणकामी साधकोंके लिये इसका अनुशीलन उपादेय है। संक्षिप्त शिवपुराण (सचित्र) [वर्ष ३६, सन् १९६२ ई०]—सुप्रसिद्ध शिवपुराणका यह संक्षिप्त अनुवाद परात्पर परमेश्वर शिवके कल्याणमय स्वरूप-विवेचन, तत्त्व-रहस्य, महिमा, लीला-विहार, अवतार आदिके रोचक, किंतु ज्ञानमय वर्णनसे युक्त है। इसकी कथाएँ अत्यन्त सुरुचिपूर्ण, ज्ञानप्रद और कल्याणकारी हैं। इसमें भगवान् शिवकी पूजन-विधिसहित महत्त्वपूर्ण स्तोत्रोंका उपयोगी संकलन भी है। संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क (सचित्र) [वर्ष ३७, सन् १९६३ ई०]—इसमें भगवान् श्रीकृष्ण और उनकी अभिन्नस्वरूपा प्रकृति-ईश्वरी श्रीराधाकी सर्वप्रधानताके साथ, गोलोक- लीला तथा अवतार-लीलाका विशद वर्णन है। इसके अतिरिक्त इसमें कुछ विशिष्ट ईश्वरकोटिक सर्वशक्तिमान् देवताओंकी एकरूपता, महिमा तथा उनकी साधना-उपासनाका भी सुन्दर प्रतिपादन है। इसकी कथाएँ रोचक, बड़ी मधुर, ज्ञानप्रद और कल्याणकारी हैं। यह वैष्णवपुराणका साररूप कहा जाता है। उपयोगी अनुष्ठेय सामग्रीके रूपमें इसमें अनेक स्तोत्र, मन्त्र, कवच आदि भी दिये गये हैं। परलोक और पुनर्जन्माङ्क (सचित्र) [वर्ष ४३, सन् १९६९० ई०]—मनुष्यमात्रको मानव-चरित्रके पतनकारी आसुरी-सम्पदाके दोषोंसे सदा दूर रहने तथा परम विशुद्ध उज्ज्वल चरित्र होकर सर्वदा सत्कर्म करते रहनेकी शुभ प्रेरणाके साथ इसमें परलोक तथा पुनर्जन्मके रहस्यों और सिद्धान्तोंपर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। आत्म-कल्याणकामी पुरुषों तथा साधकमात्रके लिये इसका अध्ययन-अनुशीलन अति उपयोगी है। श्रीहनुमान-अङ्क (सचित्र) [वर्ष ४९, सन् १९७५ ई०]—इसमें श्रीहनुमान्जीका आद्योपान्त जीवन-चरित्र और श्रीरामभक्तिके प्रतापसे सदा अमर बने रहकर उनके द्वारा किये गये क्रिया-कलापोंका तात्त्विक और प्रामाणिक एवं सुरुचिपूर्ण चित्रण है। श्रीहनुमान्जीको प्रसन्न करनेवाले विविध स्तोत्र, ध्यान एवं पूजन-विधियाँ आदि साधनोपयोगी बहुमूल्य सामग्रीका भी इसमें उपयोगी संकलन है। अतः साधकोंके लिये यह उपादेय है। शिवोपासनाङ्क (सचित्र) [वर्ष ६७, सन् १९९३ ई०]—इसमें शिवतत्त्व एवं शिवोपासनापर तथ्यपूर्ण विवेचनके साथ, भगवान् विष्णुकी शिवोपासना, जगन्माता लक्ष्मीकी शिव-निष्ठा, भगवान् नृसिंहकी शिव-भक्ति और महर्षि वसिष्ठ, दुर्वासा, लोमश, महामुनि गर्ग तथा महर्षि वाल्मीकि आदिकी शिवशरणागति एवं भक्ति-विषयक सुन्दर आख्यान हैं तथा सुप्रसिद्ध शैव-तीर्थों एवं द्वादश ज्योतिर्लिङ्गोंके वर्णनसहित इसमें भारतके एवं विश्वके सुविख्यात शिवालयों (शिव-मन्दिरों) का सचित्र वर्णन भी उपलब्ध है। अनेकों शिवभक्तों और उपासकोंके रोचक, शिक्षाप्रद चरित्र इसके उल्लेखनीय आकर्षण हैं।