श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ ൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠൠ सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। | पूर्वक कर्म करता है वह जलसे लिप्यते न स पापेन | कमलके पत्तेके समान [ उस कर्मके पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ | शुभाशुभ फलरूप ] पापसे लिप्त कायेन मनसा बुद्ध्या | नहीं होता", "योगीलोग फलविषयक केवलैरिन्द्रियैरपि । | आसक्ति छोड़कर केवल शरीर, मन, योगिनः कर्म कुर्वन्ति | बुद्धि और इन्द्रियोंसे अन्तःकरणकी सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥" | शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं", "हे ( गीता ५।१०-११ ) | कुन्तीनन्दन ! तुम जो कुछ भी कर्म करते "यत्करोषि यदश्नासि | हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ [ श्रौत यज्जुहोषि ददासि यत् । | या स्मार्तयज्ञरूप ] हवन करते हो, जो यत्तपस्यसि कौन्तेय | कुछ तप करते हो और जो कुछ तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ | दान देते हो वह सब मुझे अर्पण शुभाशुभफलैरेवं | कर दो । ऐसा करनेसे तुम शुभाशुभ मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः । | फलरूप कर्मके बन्धनसे छूट जाओगे संन्यासयोगयुक्तात्मा | और संन्यासयोगसे युक्त हो जीते-जी विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥" | ही कर्म-बन्धनसे मुक्त होकर देह- ( गीता ९।२७-२८ ) | पात होनेके बाद मुझे ही प्राप्त इति । | होगे", इत्यादि । तथा च मोक्षे क्रमं शुद्धयभावे | इसी प्रकार विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें मोक्षाभावं कर्मभिश्च तच्छुद्धिं | भी मोक्षमें क्रम, चित्तशुद्धिके अभावमें दर्शयति श्रीविष्णुधर्मे— | मोक्ष न होना और कर्मोंके द्वारा चित्तकी "अनूचानस्ततो यज्वा | शुद्धि होना—ये सब दिखाये गये कर्मन्यासी ततः परम् । | हैं—"योगी पहले वेदाध्यायी, फिर ततो ज्ञानित्वमभ्येति | यज्ञकर्ता, तत्पश्चात् कर्मसंन्यासी और योगी मुक्तिं क्रमाल्लभेत ॥" | फिर ज्ञानित्व प्राप्त करता है इस प्रकार | वह क्रमशः मुक्तिलाभ करता है",