भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

स्तद्वज्ज्ञानी न लिप्यते ॥ लिप्त नहीं होता । जिस प्रकार यद्वन्मन्त्रबलोपेतः मन्त्रबलसे सम्पन्न हुआ पुरुष सर्पोंके क्रीडन्सर्पेर्न दश्यते । साथ खेलते रहनेपर भी उनके द्वारा क्रीडन्नपि न लिप्येत नहीं डसा जाता उसी प्रकार ज्ञानी तद्वदिन्द्रियपन्नगैः ॥ इन्द्रियरूप सर्पोंके साथ क्रीडा करते रहनेपर भी उनसे लिप्त नहीं होता । मन्त्रौषधिवलैैर्यद्व- जिस प्रकार खाया हुआ विष भी ज्जीर्यते भक्षितं विषम् । मन्त्र और ओषधिके सामर्थ्यसे पच तद्वत्सर्वाणि पापानि जाता है उसी प्रकार ज्ञानीके सारे जीर्यन्ते ज्ञानिनः क्षणात् ॥” पाप एक क्षणमें नष्ट हो जाते हैं ।” तथा च सूत्रकारः—“पुरुषा- तथा सूत्रकार भगवान् व्यासजीने [स्वाभिमतसूत्र-] र्थोऽतः शब्दादिति भी “पुरुषार्थोऽतः शब्दादिति [कृन्मतोपन्यासः] बादरायणः” ( ब्र० बादरायणः” इस सूत्रसे ज्ञानको ही सू० ३ । ४ । १) इति परमपुरुषार्थका हेतु बतलाकर फिर ज्ञानस्यैव परमपुरुषार्थहेतुत्वमभि- धाय “शेषत्वात्पुरुषार्थवादो ‘शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति

१. स्वतन्त्र साधनभूत इस ( औपनिषद आत्मज्ञान ) से मोक्षरूप पुरुषार्थ सिद्ध होता है, क्योंकि इसमें [ ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि ] श्रुति प्रमाण है— ऐसा बादरायणाचार्यका मत है। २. इस सूत्रका विशद अर्थ इस प्रकार है—जैसे ‘व्रीहिभिर्यजेत’ इस व्रीहियागमें करणभूत व्रीहिके साथ ही उसका प्रोक्षण आदि भी यज्ञका अङ्ग माना जाता है उसी प्रकार आत्मा कर्तृरूपसे यज्ञ आदि कर्मका अंग होनेके कारण उसका ज्ञान भी उस कर्मका अङ्ग ही है। अतः आत्मज्ञानके महान् फलको बतानेवाली ‘तरति शोकमात्मवित्’ इत्यादि श्रुति शेषत्वात्--यज्ञादि कर्मोंका अङ्ग होनेके कारण पुरुषार्थवाद है अर्थात् पुरुष [ आत्मा ] की प्रशंसाके लिये अर्थवाद- मात्र है; जिस प्रकार कि अन्यान्य द्रव्यसंस्कारसम्बन्धी कर्मोंमें फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है। उदाहरणके लिये निम्नाङ्कित श्रुति है—‘यस्य पर्णमयी जुहूर्भवति न स पापं श्लोकं शृणोति’ ( जिसकी पलाशकी ‘जुहू’ होती है वह कभी पापमय यशका श्रवण नहीं करता) यह फलश्रुति यज्ञसम्बन्धिनी जुहूसे सम्बन्ध रखनेवाले पलाशकी प्रशंसा करनेसे यज्ञकी ही अङ्गभूत है; अतः यज्ञशेष होनेसे अर्थवाद मानी