भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

एषा विमोहिनीत्युक्ता द्वैताद्वैतस्वरूपिणी ॥ अद्वैतं भावयेद्ब्रह्म सकलं निष्कलं सदा। आत्मज्ञः शोकसंततीर्णो न बिभेति कुतश्चन ॥ मृत्योः सकाशान्मरणा- दथवान्यकृताद्भयात् । न जायते न म्रियते न वध्यो न च घातकः ॥ न बद्धो बन्धकारी वा न मुक्तो न च मोक्षदः । पुरुषः परमात्मा तु यदतोऽन्यदसच्च तत् ॥ एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा । भोगासङ्गाद्भवन्मुक्त- स्त्यक्त्वा सर्वविकल्पनाम् ॥ त्यक्तसर्वविकल्पश्च स्वात्मस्थं निश्चलं मनः । कृत्वा शान्तो भवेद्योगी दग्धेन्धन इवानलः॥ एषा चतुर्विंशतिभेदभिन्ना

यह द्वैताद्वैतस्वरूपिणी है और [ संसारको मोहित करनेवाली होनेसे ] 'विमोहिनी' कही गयी है। आत्मज्ञानीको चाहिये कि वह सर्वदा पूर्ण परब्रह्मका निष्कल और अद्वैतरूपसे चिन्तन करे। इससे वह शोकसे पार होकर किसीसे भय नहीं करता। उसे मृत्युकी सन्निधिसे, मरनेसे अथवा किसी अन्य कारणसे होनेवाले भयसे भी डर नहीं लगता। "परमपुरुष परमात्मा न जन्म लेता है, न मरता है, न मारा जा सकता है, न मारनेवाला है, न बद्ध है, न बन्धनमें डालनेवाला है, न मुक्त है और न मुक्ति देनेवाला है। उससे भिन्न जो कुछ है वह असत् है। इस प्रकार भगवान् विष्णुके विश्वरूपको मायामय और मिथ्या समझकर सब प्रकारकी कल्पनाको त्यागकर भोगोंकी आसक्तिसे मुक्त हो जाय। इस प्रकार समस्त विकल्पोंसे छूटकर मनको आत्मस्थ, निश्चल और शान्त करके योगी जिसका ईंधन जल चुका है ऐसे [ धूमरहित ] अग्निके समान हो जाता है। "यह चौबीस भेदोंवाली मायो॑


१. मायाके चौबीस भेद इस प्रकार हैं—एक प्रकृति (त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति), सात प्रकृति-विकृति (महत्तत्त्व, अहंकार और पाँच तन्मात्राएँ) और सोलह विकृति (दश इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच भूत)।