श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४७
[संस्कृत-मूलम्] काररहितमेव ब्रह्मावधारयितव्यम्। कस्मात् ? तत्प्रधानत्वात् । “अ- स्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्” (बृ० उ० ३।८।८) “अशब्दमस्पर्श- मरूपमव्ययम्” (क० उ० ३। १५) । “आकाशो वै नाम नाम- रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्- ब्रह्म” (छा० उ० ४।१४।७) “तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरम- बाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्ये- तदनुशासनम्” (बृ० उ० २।५। १९) इत्येवमादीनि निष्प्रपञ्च- ब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि। इतराणि कारणब्रह्मविषयाणि न तत्प्रधा- नानि । तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसि भवन्ति । अतस्तत्पर-
[हिन्दी-भाषार्थः] है कि ब्रह्मको रूपादि आकारोंसे रहित ही निश्चय करना चाहिये। क्यों?— इसलिये कि निर्विशेष वाक्य ही ब्रह्मका प्रधानतया प्रतिपादन करते हैं। यथा—“ब्रह्म न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है, न दीर्घ है,” ““ब्रह्म शब्द स्पर्श और रूपहीन तथा अविनाशी है”, “आकाश (आकाशसंज्ञक ब्रह्म) ही नामरूपका निर्वाहक है, वे जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है”, “वह ब्रह्म कारण-कार्यसे रहित तथा अन्तर्बाह्यशून्य है यह आत्मा सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है—यही वेदकी आज्ञा है” इत्यादि वाक्य प्रधानतया निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्वके ही प्रतिपादक है। * अन्य जो कारणब्रह्मविषयक वाक्य हैं उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्मतत्त्वके प्रतिपादनमें नहीं है। किसी भी ज्ञातव्य वस्तुके सम्बन्धमें अतत्प्रधान वाक्योंकी अपेक्षा तत्प्रधान वाक्य ही बलवान् होते हैं। अतः प्रधानतया ब्रह्म-तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली
[पाद-टिप्पणी / Footnotes] * उनका मुख्य तात्पर्य प्रपञ्चको चेतनसे अभिन्न सिद्ध करनेमें ही है। १. जिन वाक्योंमें ज्ञातव्य वस्तुकी चर्चा तो रहती है, पर उनका मुख्य तात्पर्य उस वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करनेमें नहीं होता, वे ‘अतत्प्रधान’ कहलाते हैं। २. जो वाक्य मुख्यतया ज्ञातव्य ‘वस्तु’ के तत्त्वका ही प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य रखते हैं, वे ‘तत्प्रधान’ कहे जाते हैं।