श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 63, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 63
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
घन एव । एवं वा अरेऽय- | [ अर्थात् बाहर-भीतर एक समान मात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञा- | केवल घनीभूत रस ही है] इसी प्रकार नघन एव” ( बृ० उ० ४ । | यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे ५ । १३) इति श्रुत्युपन्यासेन | रहित सब-का-सब घनीभूत प्रज्ञान विज्ञानव्यतिरिक्तरूपान्तराभावमु- | ही है” इस श्रुतिकी व्याख्या करते पन्यस्य “दर्शयति चाथो अपि | हुए उन्होंने यह दिखलाकर कि स्मर्यते” (ब्र० सू० ३ । २ । १७) | विज्ञानसे भिन्न और कोई रूप है ही इति । “अथात आदेशो नेति | नहीं “दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते” नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) । | यह सूत्र कहा है । इसमें “इससे “अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | आगे श्रुतिका यही आदेश है—यह दितादधि” (के० उ० १ । ३) । | आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है”, “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य | “वह विदितसे अन्य है और अविदितसे मनसा सह” (तैत्ति० उ० २।४।१)। | भी परे है”, “जहाँसे मनके सहित “प्रत्यस्तमितभेदं यत् | वाणी उसे न पाकर लौट आती है”, सत्तामात्रमगोचरम् । | “जो भेदसे रहित, सत्तामात्र, वाणीका वचसामात्मसंवेद्यं | अविषय और स्वसंवेद्य है वही ब्रह्म- तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ।” | संज्ञक ज्ञान है”, “सर्वरूपसे विलक्षण “विश्वस्वरूपवैरूप्यं | होना—यह परमात्माका लक्षण है” लक्षणं परमात्मनः” | इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका उल्लेख करके इत्यादिश्रुतिस्मृत्युपन्यासमु- | ब्रह्म सर्वभेदशून्य ही है—ऐसा खेन प्रत्यस्तमितभेदमेव ब्रह्मेत्यु- | प्रतिपादन कर उन्होंने “अतएव पपाद्य “अत एव चोपमा | चोपमा सूर्यकादिवत्” यह सूत्र सूर्यकादिवत्” ( ब्र० सू० ३ । | कहा है । [ इसमें यह बतलाया है—] २ । १८) इति । यत एव | क्योंकि परमात्मा चैतन्यमात्रस्वरूप,
१. 'अथात आदेशो नेति-नेति' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको निर्विशेष प्रदर्शित करती है और 'अनादिमत्परं ब्रह्म' इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है । २. इसीलिये [ सविशेष ब्रह्मके विषयमें ] जलप्रतिबिम्बित सूर्यके समान उपमा दी जाती है ।