श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार एवं पक्षान्तराणि निराकृत्य | इस प्रकार अन्य सब पक्षोंका निराकरण कर अब श्रुति यह बतलाती प्रमाणान्तरागोचरे वस्तुनि प्रका- | है कि उन ब्रह्मवेत्ताओंने प्रमाणान्तरसे ज्ञात न होनेवाले उस मूलतत्त्वके रान्तरमपश्यन्तो ध्यानयोगानु- | विषयमें अन्य किसी उपायकी गति न देखकर ध्यानयोगके अनुशीलन- गमेन परममूलकारणं स्वयमेव | द्वारा उस परममूलकारणको स्वयं ही प्रतिपेदिर इत्याह— | अनुभव कर लिया— ते ध्यानयोगानुगता अपश्य- न्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥ उन्होंने ध्यानयोगका अनुवर्तन कर अपने गुणोंसे आच्छादित परमात्माकी शक्तिका साक्षात्कार किया; जो (परमात्मा) कि अकेले ही कालसे लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणोंके अधिष्ठान हैं ॥ ३ ॥ ते ध्यानयोगेति । ध्यानं नाम | ‘ते ध्यानयोगानुगताः’ इत्यादि ध्यान चित्तकी एकाग्रताको कहते चित्तैकाग्र्यं तदेव योगो युज्यते- | हैं; वही योग है—जिसके द्वारा चित्तको युक्त किया जाय इस ऽनेनेति ध्यातव्यस्वीकारोपायः, | व्युत्पत्तिके अनुसार ध्येय वस्तुके ग्रहणका उपाय ही योग है । उसका तमनुगताः समाहिता अपश्यन् | अनुगमन कर अर्थात् समाहित हो उन्होंने देवात्मशक्तिका दर्शन— दृष्टवन्तो देवात्मशक्तिमिति । | साक्षात्कार किया ।