भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३

मनायासो मङ्गलमकार्पण्यमस्पृहेति | शौच, अनायास, मङ्गल, अकृपणता गुणाष्टकं षष्ठम् । एतैः षड्भि- | और अस्पृहा ये छठा गुणाष्टक हैं; र्युक्तम् । | इन छः अष्टकोंसे युक्तको [ कारण- | रूपसे देखा ] । विश्वरूपैकपाशं स्वर्गपुत्रान्नाद्या- | विश्वरूप एक पाशवालेको— दिविषयभेदाद्विश्वरूपं विश्वरूपो | स्वर्ग,पुत्र एवं अन्नाद्य आदि विषयभेदसे नानारूप एकः कामाख्यः पाशो- | कामनामक एक ही विश्वरूप—अनेक ऽस्येति विश्वरूपैकपाशम् । धर्मा- | प्रकारका पाश है जिसका उस धर्मज्ञानमार्गभेदा अस्येति त्रि- | विश्वरूप एक पाशवालेको; धर्म, मार्गभेदम् । द्वयोः पुण्यपापयो- | अधर्म और ज्ञानरूप जिसके मार्गभेद र्निमित्तैकमोहो देहेन्द्रियमनोबुद्धि- | हैं उस तीन मार्गभेदोंवालेको; तथा जात्यादिष्वनात्मस्वात्माभिमानो- | पाप-पुण्य इन दोनोंका एक ही ऽस्येति द्विनिमित्तैकमोहम् । अप- | निमित्त मोह यानी देह, इन्द्रिय, मन, श्यन्निति क्रियापदमनुवर्तते । | बुद्धि एवं जाति आदि अनात्माओंमें अधीम इत्युत्तरमन्त्रसिद्धं वा | जिसका आत्माभिमान है ऐसे उस क्रियापदम् ॥ ४ ॥ | दोके [ मोहरूप ] एक ही निमित्त- | वालेको [ उन्होंने कारणरूपसे देखा ] | इस प्रकार यहाँ पूर्वमन्त्रकी | क्रिया 'अपश्यन्' की अनुवृत्ति होती | है, अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद | 'अधीमः' ( जानते हैं ) का | अध्याहार करना चाहिये ॥४॥

कार्यब्रह्मका नदीरूपसे वर्णन पूर्वं चक्ररूपेण दर्शितमिदानीं | पहले जिसे चक्ररूपसे प्रदर्शित | किया है उसीको अब श्रुति नदी- नदीरूपेण दर्शयति— | रूपसे दिखलाती है—