भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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जीभ को उलट कर इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा वाले संगम-त्रिपथ में लगाना चाहिये, यह व्योमचक्र है, यही खेचरी मुद्रा है। कलां पराङ्मुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् । सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥ चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे गता। तेनैषा खेचरी नाम मुद्रा सिद्धैर्निरूपिता ॥ ऊर्ध्वजिह्वः स्थिरो भूत्वा सोमपानं करोति यः। मासार्धेन न सन्देहो मृत्युं जयति योगवित् ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ३। ३७, ४१, ४४ ) तालु के ऊपर विवर में ऊर्ध्वमुखी जीभ से सहस्रार से क्षरित चन्द्रामृत का तालु-आधार में पान कर योगी पन्द्रह दिनों में ही मृत्यु के भय से रहित हो जाता है। एकादशमथ जिह्वाधारं तत्र जिह्वाग्रं धारयेत् सर्वरोग- नाशो भवति ॥ २० ॥ ग्यारहवाँ जिह्वाधार है। जिह्वामूल में जिह्वा के अग्रभाग को लगाना (स्पर्शपूर्वक स्थिर करना) चाहिये। इस अभ्यास से (साधक के) समस्त रोगों का नाश होता है ॥ २० ॥ द्वादशं भ्रूमध्याधारं तत्र चन्द्रमण्डलं धारयेत्, शीतलतां याति ॥ २१ ॥ बारहवाँ भ्रूमध्याधार है। वहाँ चन्द्रमण्डल का ध्यान करना चाहिये, उसकी धारणा करने से-ध्यान करने से साधक का अङ्ग शीतल-हृष्टपुष्ट और प्रसन्नतायुक्त होता है ॥ २१ ॥ विशेष—दोनों भृकुटियों का मिलन-स्थान ही भ्रूमध्याधार है, यह आज्ञा चक्र का स्थान है। यहाँ दृष्टि एकाग्र कर जब साधक शुभ्र, स्वच्छ-निर्मल चन्द्र-, मण्डल का ध्यान करता है, तब उसका शरीर सौम्य, शान्त और स्थिर हो जाता है। इस स्थान से मन विशेष रूप से अमनस्क की भूमिका में पहुँच जाता है, ६० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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