भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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पद्मासन में स्थित जो योगी नाड़ी-द्वार से पूरित की गयी वायु स्थिर कर लेता है—सुषुम्ना में स्थापित कर ऊर्ध्वमुखी कर लेता है, वह मुक्त ( अपने स्वरूप में स्थित ) हो जाता है । स्वरूप में स्थिति की दृढ़ता के लिये सिद्धासन का अभ्यास बहुत आवश्यक है । योनिस्थानकमङ्घ्रिमूलघटितं कृत्वा दृढं विन्यसेन् मेढ्रेपादमथैकमेव नियतं कृत्वा समं विग्रहम् । स्थाणुः संयमितेन्द्रियोऽचलदृशा पश्यन् भ्रुवोरन्तर मेतन्मोक्षकपाटभेदनकं सिद्धासनं प्रोच्यते ॥ ( गोरक्षशतक-११ ) गुदा और मेढ्र के मध्य में योनि, कुण्डलिनी-स्थान है। योगी इस योनि स्थान को बायें पैर की एड़ी से दबा कर दायें पैर की एड़ी को मेढ्र ( उपस्थ ) पर लगा ले, शरीर को सीधा रखे, सभी इन्द्रियों को वश में रखे, भ्रू के मध्य में दृष्टि को स्थिर कर बिना हिले-डुले रहे, यही मोक्ष के दरवाजे को खोलनेवाला सिद्धासन कहा गया है । यह आसन सिद्धों को भी सिद्धि प्रदान करनेवाला है । इस सिद्धासन के अभ्यास से साधक को योगज्ञान प्राप्त हो जाता है । वायु के अभ्यासी के लिये यह आसन बड़ा उपयोगी है । योगी संसार-सागर से पार होकर मुक्तिपूर्वक परम गति पाता है । इसके ध्यान मात्र से योगी पाप से छूट जाता है । येनाभ्यासवशात् शीघ्रं योगनिष्पत्तिमाप्नुयात् । सिद्धासनं सदा सेव्यं पवनाभ्यासिना परम् ॥ ये संसारमुत्सृज्य लभते परमां गतिम् । नातः परतरं गुह्यासनं विद्यते भुवि । येनानुध्यानमात्रेण योगी पापाद् विमुच्यते ॥ ( शिवसंहिता ३ । १०३-१०४ ) सिद्धासन का अभ्यास अत्यन्त शुभकारी और परमोपयोगी है । प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता । रेचकपूरककुम्भक संघटकरणानि चत्वारि प्राणायामलक्षणानि ॥ ३५ ॥ ७६ ] { सिद्धसिद्धान्तपद्धति