सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राणायाम है। यही प्राण-अपान अथवा अपान-प्राण का पारस्परिक हवन अथवा . यज्ञकर्म है। यही संघटककरण प्राण-अपान का मेलन है । महायोगी गोरखनाथ जी ने कहा है कि अपान-वायु के निरोध से देह में स्थित प्राणवायु का उसमें एकश्वासमय होकर ऊर्ध्वगामी होना प्राणापान के मेलन अथवा ऐक्य का स्वारस्य है । प्राणो देहे स्थितो वायुरपानस्य निरोधनात् । एकश्वासमयो भूत्वोद्घाटयेद् गगने गतिम् ॥ ( विवेकमार्तण्ड १०४) महर्षि घेरण्ड का कथन है कि प्राणायाम के साधन से आकाशगमन, रोगनिवृत्ति तथा कुण्डलिनी का जागरण होता है । चित्त में आनन्द उत्पन्न होता है और प्राणायाम का अभ्यास करने वाला सुखी होता है । प्राणायाम से उन्मनी सिद्ध होती है । प्राणायामात् खेचरत्वं प्राणायामाद् रोगनाशनम् । प्राणायामाद् बोधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनोन्मनी । आनन्दो जायते चित्ते प्राणायामी सुखी भवेत् ॥ ( घेरण्ड-संहिता ५।५६ ) प्राणायाम के अभ्यास से ही अजपा गायत्री सिद्ध होती है, साधक आकाश- चक्र में शिव का साक्षात्कार करता है । प्रत्याहारमिति चैतन्यतुरङ्गाणां प्रत्याहरणं विकारग्रसन उत्पन्नविकारस्यापि निवृत्तिर्निभातीति प्रत्याहार लक्षणम् ।।३६।। प्रत्याहार का वर्णन किया जाता है । चैतन्य आत्मा के इन्द्रियरूपी घोड़ों के ( उनके शब्द, रूप, रस, स्पर्श, गन्धादि में) प्रत्याहरण से उनके विकारग्रस्त होने से उत्पन्न विकारों की समाप्ति हो जाती है—यही प्रत्याहार का लक्षण है ।। ३६ ।। विशेष--प्रत्याहार के सम्बन्ध में हमारे औपनिषद वाङ्मय तथा योग- शास्त्रों में विशद विवेचन उपलब्ध होता है। महायोगी गोरखनाथ ने इन्द्रियों को तुरंग माना हैं, इसी तरह उपनिषदों मैं इन्द्रियों को तुरंग (घोड़ों) के रूप में सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ७९