सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंजाने में सुरक्षा समझती है, इसी तरह मन का धर्म स्थैर्य्य है, स्थिरता ही उसकी सुरक्षा है। यह इन्द्रियरूपी घोड़ों के लिये प्रग्रह--लगाम है। मन मकड़ी का ताग ज्यूं उलटि अनूठी आंणि । ( गोरखवानी सबदी २३४ ) प्रत्याहार इन्द्रियविजय का महान् साधन है । अपने विषयों के सम्बन्ध से रहित होने पर इन्द्रियों का चित्त के स्वरूप में तदाकार हो जाना ही प्रत्याहार है । प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर योगसाधक की इन्द्रियाँ उसके वश में हो जाती हैं । स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः । ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम् । ( पातञ्जलयोगदर्शन २ । ५४-५५ ) इन्द्रियों की वश्यता, प्राण और मन की स्थिरता पर निर्भर है । हठयोग की साधना में स्पष्ट निर्देश है कि शरीर में प्राण की स्थिरता से ही मन स्थिर होता है, इसलिये प्राणसाधना इन्द्रियों के प्रत्याहार की दिशा में आवश्यक है । प्रत्याहार की सिद्धि से काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ, मोह आदि छः शत्रुओं का नाश हो जाता है। जहाँ-जहाँ मन जाता है, उसे वहाँ-वहाँ से लौटा कर आत्मा के वश में करना चाहिये, यही प्रत्याहार है । महर्षि घेरण्ड की दृष्टि में : यतो यतो मनश्चरति चाञ्चल्यवशतः सदा । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥ ( घेरण्डसंहिता ४ । २ ) रेचक-पूरक-कुम्भक, लयक्रमपूर्वक बारह बार प्राणायाम कर वायु को शरीर के भीतर स्थिर करने से मन स्थिर होता है और प्राणायाम के द्वारा इस तरह इन्द्रियों का प्रत्याहार हो जाता है । प्राणायामद्विष्ट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः । ( विवेकमार्तण्ड ११७ ) —शिवसंहिता में प्रत्याहार के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है कि जब योग- साधक एक प्रहर तक वायु-धारण की शक्ति प्राप्त करता है, तब प्रत्याहार होता है । योगसाधक को जिस-जिस पदार्थ की जानकारी हो, उसमें उसे आत्मभाव सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८१