भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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देषा स्तम्भकरी सदा क्षितिजयं कुर्याद् भुवो धारणा । अर्धेन्दुप्रतिमं च कुन्दधवलं कण्ठेऽम्बुतत्त्वं स्थितं तत्पीयूषवकारबीजसहितं युक्तं सदा विष्णुना । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा दुःसहकालकूटजरणी स्यादम्बवी धारणा ॥ यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्त्वं त्रिकोणांज्वल- तेजोरेफयुक्तं प्रवालरुचिरं रुद्रेण यत्सङ्गतम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा वह्निजयं सदा विदधती वैश्वानरी धारणा ॥ यद्भिन्नाञ्जनपुञ्जसन्निभमिदं वृत्तं भ्रुवोरन्तरे तत्त्वं वायुमयंयकारसहितं तत्रेश्वरो देवता । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा खेगमनं करोति यमिनां वै वायवी धारणा । आकाशं सुविशुद्धवारिसदृशं यद् ब्रह्मरन्ध्रे स्थितं तन्नाथेन सदाशिवेन सहितं शान्तं हकाराक्षरम् । प्राणं तत्र विलीय पञ्चघटिकाश्चित्तान्वितं धारये- देषा मोक्षकपाटपाटनपटुः प्रोक्ता नभोधारणा । ( विवेकमार्तण्ड १५८-१६२ ) यह हरिताल स्वर्ण के समान रुचिर है, यह 'ल' कार बीज से युक्त है, इसके अधिष्ठातृ देवता ब्रह्मा हैं, यह चौकोर है, हृदय में स्थित है, मनसहित प्राण को इसमें लीन कर लेना ही पृथ्वीतत्व की धारणा है, इसका पांच घड़ी ( दो घंटे ) तक अभ्यास करना चाहिये, इसके प्रभाव से पृथ्वीतत्व वश में हो जाता है। ( इस धारणा के प्रभाव से साधक मृत्यु को वश में कर लेता है।) जलतत्व अर्धचन्द्राकार कुन्द पुष्प के समान श्वेत है, यह कण्ठ में अमृतरूप वकार बीजयुक्त के समान स्थित है, विष्णु इसके अधिष्ठातृ देवता हैं, इस जलतत्व की प्राण और मन का विलय कर पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे दुःसह कालकूट विष भी भस्म हो जाता है, यह वारुणी धारणा है। इस धारणा से न तो जल का भय रहता है और न जल से मृत्यु होती है। अग्नितत्व तालु में स्थित है, यह इन्द्रगोप के समान लाल, मूँगे के समान रुचिर है, यह त्रिकोण है, तेजःस्वरूप 'र' बीज से युक्त है। इसके अधिष्ठातृ देवता रुद्र हैं, चित्त को प्राण में लीन कर इस तत्व की पाँच घड़ी तक धारणा करनी चाहिये, इससे अग्नितत्व सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८३