सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकी रसतन्मात्रा, अग्नि की रूपतन्मात्रा, वायु की स्पर्श तन्मात्रा और आकाश की शब्दतन्मात्रा ही सूक्ष्मावस्था है । चौथी अन्वय-अवस्था है । पाँचों भूतों में तीनों गुणों के स्वभाव ( प्रकाश, क्रिया और स्थिति ) की व्याप्ति ही अन्वय-अवस्था है । पाँचवीं अर्थवत्व-अवस्था का तात्पर्य है कि पाँचों भूत पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिये हैं । इन भूतों की प्रत्येक अवस्था के क्रम से सम्पूर्ण अवस्थाओं में संयम कर जब योगसाधक इन को प्रत्यक्ष कर लेता है, तब उसका इन भूतों पर- तत्वों पर अधिकार हो जाता है । अथ ध्यानमिति कश्चन परमाद्वैतस्य भावः स एवात्मेति यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु समदृष्टिश्च इति ध्यानलक्षणम् ॥ ३८ ॥ ( अष्टांगयोग के सातवें अंग ) ध्यान का वर्णन किया जाता है । ( नाम- रूप से परे ) अद्वैतस्वरूप परमात्मा है, यही आत्मा है । जो-जो वस्तु प्रतीत हो, उस में आत्मस्वरूप की ही भावना करनी चाहिये, समस्त भूतमात्र में समदृष्टि- आत्मदृष्टि अथवा आत्मस्वरूप की ( सभी प्राणियों में एकमात्र परमात्मा की व्याप्ति की ) भावना ही ध्यान है । यही ध्यान का लक्षण है ॥ ३८ ॥ विशेष-महायोगी गोरखनाथजी ने अष्टांगयोग के सातवें अंग ध्यान की सार्थकता के लिये निराकार आत्मस्वरूप में तथा सम्पूर्ण चैतन्य-परमात्मा की अभिव्यक्ति में समदृष्टि को बड़ा महत्व दिया है । अपनी एक संक्षिप्त रचना में उन्होंने कहा है कि एकमात्र ध्येय-ध्यान का विषय निरञ्जन है, निरञ्जन के उपरान्त ध्यान के लिये रह ही क्या जाता है : निरंजन उपरांति ध्यान नाहीं । ( गोरखबानी-सिष्टपुराण ) गोरखनाथजी का कथन है कि ध्यान दर्शन है, चैतन्य तत्व का सर्वत्र अनुभव ही दर्शन अथवा ध्यान है । साधक आज्ञाचक्र में स्थित दोनों भ्रू के मध्य में प्रदीप्त ज्ञानदीप्ति- -ज्ञाननेत्र अथवा शिवनेत्र की ज्योति से समृद्ध होकर दर्शन की सीमा में-ध्यान की दशा में अलखनिरञ्जन--परमेश्वर शिव में प्रतिष्ठित हो जाता है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ८५