सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै, वहाँ अनुपमस्वरूप भगवान् शिव पिण्ड में स्थित हैं। जिह्वामूल ( लम्बिका के मूल ) में भैरवलोक है, वहाँ सर्वोत्तमस्वरूप भैरव देवता विराजमान हैं। ललाटदेश में अनादि लोक है, वहाँ अनादि ( शिव ) पिण्ड के मध्य में आनन्दमय परम अहंतारूपी विद्यमान हैं। इस देहपिण्ड में भृकुटी से कुछ ऊपर शृङ्गाट-स्थान है, उसमें कुल लोक है, वहाँ ( शक्तियुक्त ) कुलेश्वर ( शिव ) आनन्दस्वरूप विराजमान हैं। शंख नाड़ी के ऊपर मध्य में नलिनी स्थान में अकुलेशलोक है, वहाँ अभिमान-अवस्था से रहित ( निर्विकार-निरञ्जन ) साक्षात् परमशिव— अकुलेश्वर देवता विद्यमान हैं। ब्रह्मरन्ध्र मे परब्रह्मलोक है, वहाँ अखण्ड-अनन्त पूर्ण परब्रह्म विराजमान है। ऊर्ध्व कमल सहस्रार में परमेश्वर -- परापर भाव में विद्यमान हैं। सहस्रार के ( परापर लोक के ) ऊपर त्रिकूट-त्रिशिखर-लोक में ( शक्तिलोक में ) अपने अस्तित्वस्वरूप में सर्वनियामिका और सर्वस्व कर्तृत्वरूपा पराशक्ति विराजमान है। इस तरह व्यष्टि-पिण्ड में सप्त पातालसहित इक्कीस ब्रह्माण्ड स्थान का विचार ( वर्णन ) किया गया ॥ ५ ॥ विशेष —ये विष्णुलोकादि परमात्मा के ब्रह्माण्ड-शरीर के अन्तर्गत व्याव- हारिक अस्तित्वों से विभिन्न स्तरों के रूप में स्वीकृत हैं। ये उच्चलोक सामान्य तथा असामान्य इन्द्रियानुभवों के क्षेत्रों के ऊपर हैं तथा उनमें से कुछ हमारी साधारण मानसिक और बौद्धिक धारणाओं के क्षेत्र के भी ऊपर हैं। गुरु के प्रसाद— अनुग्रह से हमारी चेतना आन्तरिक रूप से इन लोकों के स्तरों पर उठती है तथा शरीर के अन्तर्गत इन स्तरों के सत्य का स्पष्ट अनुभव प्रकाशित अथवा प्राप्त होता है। चार वर्ण आदि सदाचारतत्त्वे ब्राह्मणास्तिष्ठन्ति । शौर्ये क्षत्रिया व्यवसाये वैश्याः सेवाभावे शूद्राश्चतुष्षष्ठिकलास्वपि चतुष्षष्ठि वर्णाः ॥ ६ ॥ सदाचार में ब्राह्मण, वीरता (शौर्य) में क्षत्रिय, व्यवसाय में वैश्य, सेवाभाव में शूद्र, चौसठ कलाओं ( के व्यवहार ) में चौसठ तरह के ( कलाव्यवसायी ) लोग स्थित रहते हैं ॥ ६ ॥ विशेष—महायोगी गोरखनाथजी का कथन है कि वर्णाश्रमसम्मत आचार-विचार से सम्पन्न संयमित जीवन वाले सभी लोग योग की साधना के अधिकारी हैं और सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ६७