सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं, वह सभी के ऊपर विराजमान परम सत्ता होने से विमर्शरूपिणी विद्या है । योगियों को ( भगवती कुण्डलिनी की साधना से ) आत्मस्वरूप की प्राप्ति ( अलख निरञ्जन परमात्मा का साक्षात्कार ) सहज ही हो जाती है, यह बात प्रसिद्ध है ॥ १५ ॥ विशेष – हठयोगप्रदीपिका में निर्देश है कि शक्तिबोध से योगी को सहजा- वस्था की प्राप्ति स्वयं हो जाती है । उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः । योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ ( हठयोगप्रदीपिका ४ । ११ ) जीवात्मा और परमात्मा का अभेद ज्ञान ही सहज ज्ञान है । यही स्व- विश्रान्तिरूप अद्वैत पद अथवा परम पद है । मध्यशक्तिप्रबोधन मध्यशक्तिप्रबोधेन अधःशक्तिनिकुञ्चनात् । ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥ १६ ॥ ( नाभिदेशस्थ मणिपुर चक्र में स्थित कुण्डलिनी मध्य शक्ति कही जाती है । मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी अधःशक्ति के रूप में प्रसिद्ध है । सहस्रदल में यही शक्ति ऊर्ध्व शक्ति के रूप में विराजमान होती है ।) मध्य शक्ति को जगाने से और अधः शक्ति के ऊपर की ओर आकर्षण से तथा ऊर्ध्व शक्ति ( कुण्डली ) के निपात—संयोजन से परम पद की प्राप्ति होती है ॥ १६ ॥ विशेष — मूलाधार में आधार पद्म है, यह चार दलों वाला है । यह चक्र कुलाभिध कहलाता है, इसमें कुण्डलिनी शक्ति सर्प के समान आकृतिवाली सुप्ता अवस्था में पड़ी रहती है । तत्पद्ममध्यगा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ ( शिवसंहिता ५ । ८५ ) आधार कमल की कर्णिका में त्रिकोणाकार योनि—कामगिरि पीठ में अधः शक्ति कुण्डलिनी रहती है । इसको अपान वायु के निकुञ्चन—आकर्षण से ऊर्ध्व सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १११