सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयही कारण है कि बड़े-बड़े सिद्धयोगी गुरु के कृपाकटाक्ष और अपने ( मनोनिग्रहादि योगसाधना के ) अनुभव से स्वरूप-बोध में समर्थ होकर अपने व्यष्टिशरीर का निरुत्थानानुभव ( व्यापक पर-पिण्ड में अभेदता ) के समाश्रय में सामरस्य करते हैं—परमात्मस्वरूप परमपद की प्राप्ति के द्वारा सच्चिदानन्द स्वरूप हो जाते हैं—जीवात्मा-परमात्मा में पूर्ण अभेदता की प्रतिष्ठा ही यह व्यष्टि पिण्ड से परपिण्ड का सामरस्य है ॥ ७ ॥ विशेष—गुरु की वन्दना में महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक के मांगलिक श्लोक में इसी सामरस्य को परिलक्षित किया है । श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् । यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥ ( गोरक्षशतक-१ ) गोरखनाथ का कथन है कि मैं अपने गुरुदेव की वन्दना करता हूँ, जो साक्षात् परमानन्द हैं, जो सच्चिदानन्दस्वरूप—आनन्दविग्रह अथवा मूर्तिमान् आनन्द हैं, जिनके सान्निध्यमात्र से ही—कृपाकटाक्ष से ही यह शरीर चिदानन्द, चिन्मय, परमानन्द, परमात्मस्वरूप हो जाता है । निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय निरुत्थानप्राप्त्युपायः कथ्यते । महासिद्धयोगिनः स्वस्व- रूपतथ्यानुसन्धानेन निजावेशो भवति निजावेशान्निःपीडित निरुत्थानदशामहोदयः कश्चिज्जायते ततः सच्चिदानन्दचम- त्काराद्भुताकारप्रकाशप्रबोधो जायते, प्रबोधादखिलमेतद् द्वयाद्वयप्रकटतया चैतन्यभासाभासकं परात्परपरमपदमेव प्रस्फुटं भवतीति सत्यम् ॥ ८ ॥ निरुत्थान ( जीवात्मा-परमात्मा के अभिन्नत्व, एकत्वं अथवा सामरस्य ) की प्राप्ति के उपाय का वर्णन किया जाता है । अभेद रूप परमपद को चाहनेवाले योगी का अपने स्वरूप के अनुसन्धान से ( स्व-परपिण्ड की अभेदता के द्वारा ) निजावेश होता है—वह परमेश्वर को अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित देखता है । १२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति