भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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निज पिण्डपरीक्षा ( से आशय ) यह है कि अपने शरीर में भी परमात्म- स्वरूपकिरणरूप आनन्द का ही विकास है और इस प्रकाश के उन्मेष को अपने ही ( व्यष्टिपिण्ड के ) भीतर समेट कर परमात्मा से अभिन्न अथवा अभेद अनुभव करना ही सामरस्य है ॥ ११ ॥ अतएव स्वकीयं पिण्डं महद्रश्मिपुञ्जं स्वेनैवाकारेण प्रतीयमानं स्वानुसन्धानेन स्वस्मिन्तुरीकृत्य महासिद्धयोगिनः पिण्डसिद्ध्यर्थं तिष्ठन्तोति प्रसिद्धम् ॥ १२ ॥ परमात्मप्रकाश के अपने व्यष्टि-पिण्ड में प्रत्याहरण के परिणामस्वरूप यह शरीर महाप्रकाशपुञ्जरूप में आकारित ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) हो उठता है । इस तरह अपने व्यष्टि-पिण्ड में परमात्म-प्रकाश के प्रत्याहरण—सामरस्यकरण द्वारा सिद्धयोगी देहसिद्धि — चिन्मय स्वरूप-स्वानन्दविग्रह की प्राप्ति से चिरकाल तक अजर-अमर रहते हैं ॥ १२ ॥ पिण्डसिद्धि का वेष अथ पिण्डसिद्धौ वेषः कथ्यते— शङ्खमुद्राधारणं च केशरोमप्रधारण ममरीपानममलं तथा मर्दनमुत्तमम् ॥ १३ ॥ एकान्तवासो दीक्षा च संध्याजपममायया । ज्ञानं भैरवमूर्त्तंस्तु तत्पूजा च यथाविधि ॥ १४ ॥ शङ्खध्मातं सिंहनादं कौपीनं पादुके तथा । अङ्गवस्त्रं बहिर्वस्त्रं कम्बलं छत्रमद्भुतम् ॥ १५ ॥ वेत्रं कमण्डलुञ्चैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् । कुर्यादेतान् प्रयत्नेन गुरुवन्दनपूर्वकम् । । १६ । पिण्ड ( देह )-सिद्धि हो जाने पर योगी—योगसिद्ध ( परमात्मपदप्राप्त ) के वेषधारण का वर्णन किया जाता है । उसे ( गले और हाथ में ) शंख और (दोनों कानों में) मुद्रा को धारण करना चाहिये, केश और रोम धारण करना चाहिये १२४ । [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति