सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 222 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्प्रकाशपरानन्दौ यस्य वै कुण्डलद्वयम् । जपमालाक्षविश्रान्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ६ । यस्य धैर्यमयोदण्डः पराकाशञ्च खर्परम् । योगपट्टो निजा शक्तिः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १० । पादुका परमात्म-ज्ञान का स्वरूप है, जिसने पैर में पादुका को धारण किया है, (आन्तरिक लक्षण के रूप में ) जो परमात्म-ज्ञान के आश्रय में स्थित है, जिसने मृगचर्म धारण किया है अथवा (मृगचर्मरूप) अनाहत नाद से जो विशोभित है, पराशक्तिरूप (चिद्रूप) ज्ञान से जो युक्त है अथवा परासंवित् रूप शेली जिसने गले में धारण की है, वह अवधूत कहा जाता है। जिसने कटि में मेखला पहनी है अथवा जो मेखलारूप (प्रापंचिक विषयों में) निवृत्ति को धारण करने वाला है, जो स्थिर आसन पर स्थित है अथवा स्थितआसनरूपी आत्म- स्वरूप में ही जो संस्थित है, जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर—छः विकारों से निवृत्त—परे है, वही अवधूत है। जिसने कानों में दो कुण्डल धारण किये हैं अथवा चित्प्रकाश और परमानन्द से जो सम्पन्न है, जपमाला धारण कर (मन्त्रजापपूर्वक) जो आत्मसत्ता का स्मरण करता है अथवा जिसकी दृष्टि में विषय-प्रपंचों से उपरति ही चित्त-विश्रान्ति है, वही अवधूत कहा जाता है। जो दण्ड धारण करता है अथवा धैर्य धारण करना जिसके लिये (योगसाधना में) दण्डरूप है, जो हाथ में खर्पर (खप्पर) धारण करता है या पराकाश ही जिसके लिये खर्पर है और जो योगपट्टधारण करता है अथवा निजाशक्ति ही जिसके लिये योगपट्ट है, वही अवधूत कहा जाता है ॥ ७–१० ॥ भेदाभेदौ स्वयं भिक्षां कृत्वा स्वास्वादने रतः । जारणातन्मयो भावः सोऽवधूतोऽभिधीयते । ११ । अचिन्त्ये निजदिग्देशे स्वान्तरं वस्तु गच्छति । एकदेशान्तरीयो यः सोऽवधूतोऽभिधीयते । १२ । स्वपिण्डममरीकर्तुमनन्ताममरीं च यः । स्वयमेवपिबेदेतां सोऽवधूतोऽभिधीयते । १३ । अचिन्त्यावज्ज्रवद्गाढ़ा वासनामलसंकुला । १४६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति