भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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लीलयारमते लोके सोऽवधूतोऽभिधीयते । क्वचिद् भोगी क्वचित्त्यागी क्वचिन्नग्नोदिगम्बरः । क्वचिद्राजा क्वचाचारी सोऽवधूतोऽभिधीयते । १९ । जो अपने अखण्ड आत्मस्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभवी—साक्षात्कार करने वाला है और अपने उस स्वरूप में स्थित है और अनुत्थान ( आत्मा-परमात्मा के ऐक्य ) भाव में तल्लीन है, वही अवधूत कहलाता है । जो परमात्मा-आत्मा के एक स्वरूपमय तादात्म्य में स्वाश्रित—आत्माभिव्यक्त है और सत्स्वरूप में स्थिति ( विश्रान्ति ) का स्वामी है और धैर्यपूर्वक सच्चिदानन्द—परमात्मतत्व में स्थित है—व्यक्त है तथा स्व में भी लीन ( अव्यक्त ) हो जाता है अथवा व्यक्त को अव्यक्त और अव्यक्त परमात्मा को व्यक्त करता है, वह ( अपने भीतर सत्स्वरूप में विद्यमान ) अवधूत कहा जाता है। जो समस्त चराचररूप जगन्मात्र का प्रकाशक है और अपनी ही अन्तर्ज्योति—अखण्डपरमात्म प्रकाश में आनन्द का अनुभव करता है और इस लोक में—लोकव्यवहार में स्वस्थ है, वह अवधूत कहलाता है। जो भोगी, योगी, नग्न दिगम्बर, योगिराज तथा गुरु—सभी रूपों में अखण्ड स्वरूप में प्रतिष्ठित रह कर जीवन धारण करता है, वही अवधूत कहलाता है ॥ १६-१९ ॥ एवं विध नानासंकेतसूचको नित्यप्रकाशे वस्तुनि निजस्व- रूपी सर्वेषां सिद्धान्तदर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने सम्यक् सद्- बोधकोऽवधूत योगीत्यभिधीयते स सद्गुरुर्भवति । यतः सर्व- दर्शनानां स्वस्वरूपदर्शने समन्वयं करोति सोऽवधूतयोगो स्यात् । २० । इस तरह नित्य प्रकाश—शुद्ध, बुद्ध, व्यापक आत्मस्वरूप में ही अनेक ( विभिन्न ) सिद्धान्त-दर्शनों का स्वरूप-दर्शन में ही सद्बोध सिद्ध ( प्रकाशित ) करने वाला अवधूत कहा जाता है, वह योगी अवधूत सद्गुरु होता है; क्योंकि वह सभी दर्शनों ( अभेदात्मदर्शी मतों ) का स्वरूप में ही समन्वय ( आत्मानुभव ) करता है। वास्तव में सर्वत्र आत्मदर्शन करने वाला योगी ही अवधूत है ॥ २० ॥ १४८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति