भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

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गते न शोकं विभवे न वाञ्छा प्राप्ते न हर्षं स करोति योगी । आनन्दपूर्णो निजबोधलीनो न बाध्यते कालपथेन नित्यम् । ६८ । विश्वातीत ( संसार में व्यापक परब्रह्म ) परमेश्वर से जो निर्विकल्प समाधि में अभिन्न, तद्रूप अथवा तदाकार हो जाता है, वह योगी है। जो अपने मन की समस्त वृत्तियों को आत्मा में लय कर लेता है, वही सिद्धों के सिद्धान्त में परम शक्तिशाली महायोगी के रूप में सम्मानित होता है । जो विषयप्रपंच से रहित हो जाता है, सदा इस तरह उदासीन होकर शान्त रहता है, अपने स्वस्वरूप में स्थित रहकर उसका ( चैतन्यरूप में ) प्रकाशक होता है, जो सच्चिदानन्द में स्थित होकर नित्य कूटस्थ--असंग रहता है, वही सिद्धयोगिराज कहा जाता है । जो अखण्डचेतनस्वरूप होता है, सदा द्वन्द्वातीत होकर प्रसन्न रहता है, जो स्वाश्रित होता है अथवा समस्त प्रापंचिक उपाधियों से परे होकर नित्य अखण्ड स्वरूप में अधिष्ठित रहता है, जो निर्विकार और आनन्दस्वरूप होता है, वही सिद्ध योगिराज है । वह किसी पदार्थ अथवा धन आदि के नष्ट हो जाने पर शोक नहीं करता, सम्पत्ति आदि प्राप्त करने की उस (योगिराज) में वांछा नहीं होती, न प्राप्त होने पर उसे हर्ष होता है, अपने स्वसंवेद्यस्वरूप में वह परमानन्द में लीन रहता है, उसे मृत्यु से कोई बाधा नहीं रहती ॥ ६४-६८ ॥ सर्वसिद्धान्तदर्शनसमन्वयो एवं तु सर्वसिद्धान्तदर्शनानां पृथक् पृथग् भूतानामपि ब्रह्मणि समन्वयसूचनशीलोपदेशकत्र्ताऽवधूत एवं कर्ता सद्गुरुः प्रशस्यत एषामुपदेशानां पृथक् पृथक् सूचितानां जायते यत्र विश्रान्तिः सा विश्रान्तिर्विधीयते । ६९ । लीनतां च स्वयं याति निरुत्थानचमत्कृतेः । यतो निरुत्थानमयात् सोऽयं स्यादवधूतराट् । ७० । तस्मात्तं सद्गुरुं साक्षात् वन्दयेत् पूजयेत्सदा । सम्यक् सिद्धपदं धत्ते तत्क्षणात्स्वात्मभाषितम् । ७१ । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५६