भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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सम्बन्ध, दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति, जड़ से असंगता, असत् से परे सद्ज्ञान की प्रतिष्ठा, कर्म में परमेश्वर की आराधना और आत्मज्ञान अथवा अखण्ड ब्रह्मज्ञान में स्वरूपबोध के उद्गम का मूल प्रवाह दर्शनीय है । योग के सम्बन्ध में प्राचीन काल से ही तन्त्र और देहात्मवादी दर्शनों के परिप्रेक्ष्य में अनेकानेक भ्रामक और गलत धारणाओं से सत्य के प्रति जिज्ञासु साधकों को दिग्भ्रमित होना पड़ा । महायोगज्ञानामृत से तृप्त होने वाले उत्सुक प्राणियों को विभिन्न साम्प्रदायिक और दार्शनिक मान्यताओं के कठघरों में बड़ी- बड़ी प्रताड़नायें सहने पर भी सत्स्वरूप का बोध दुर्लभ होता गया । योग के सत्सिद्धान्तों को अपनी-अपनी मान्यताओं के वाग्जाल में उलझा कर योगमार्ग में सही प्रगति की दिशा में बढ़ने वालों को बड़े-बड़े तथाकथित आत्मज्ञानियों और परमात्मतत्व की चर्चा करने वालों ने भ्रमित कर दिया । अतएव, 'सिद्धसिद्धान्त- पद्धति' ऐसे भ्रमित जिज्ञासुओं के लिये एक ध्रुव अक्षर प्रकाश है, जिसके द्वारा चिरकाल तक लोग योग का सही-सही मूल्यांकन करते हुए साधना में अनायास सहजसिद्ध स्वरूपबोध प्राप्त करते रहेंगे । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना की आधारशिला है परमपद की सहज प्राप्ति, जिसमें जीवात्मा और परमात्मा में अभेदता—सम्पूर्ण सामरस्य अथवा ऐक्य की स्थापना हो जाती है । यह निर्विवाद है कि जहाँ पातञ्जल योग का दर्शन समाप्त होता है, वहाँ नाथयोग-ज्ञान का साधना और दार्शनिकता के स्तर पर आरम्भ होता है । महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगानुशासन के प्रकाश में चित्तवृत्तिनिरोध को योगसिद्ध कर द्रष्टा के स्वरूपावस्थान को उसका अमोघ फल बताया है । 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' ( पातञ्जलयोग० १ । ३ ) गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अष्टांगयोग का स्वरूप विवेचित करते हुए इस चित्तवृत्तिनिरोधरूप पातञ्जल योग को नियम के अन्तर्गत निश्चित कर मत व्यक्त किया है । 'नियम इति मनोवृत्तिनां नियमनम्' ( सि० सि० प० २ । ३३ ) इस तरह मनोवृत्ति के नियमन में ही पतञ्जलि द्वारा स्वीकृत योग की प्रतिष्ठा कर 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' को 'आसनमिति स्वस्वरूपे समा २२ ]