सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ नमो भगवते गोरक्षनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धति पहला उपदेश आदिनाथं नमस्कृत्य शक्तियुक्तं जगद्गुरुम् । वक्ष्ये गोरक्षनाथोऽहं सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् ॥ १ ॥ ( अलख निरञ्जन ) आदिनाथ ( परमेश्वर ) शक्तियुक्त ( शिव ); जगद्गुरु ( जगत् के प्रकाशक ) को नमस्कार कर मैं गोरक्षनाथ ( गोरखनाथ ) सिद्धसिद्धान्तपद्धति ( सिद्धों द्वारा उपदिष्ट तथा आचार में प्रयुक्त योगमहाज्ञान- पद्धति ) का विवेचन ( प्रक्रियात्मक वर्णन अथवा प्रवचन ) करता हूँ ॥ १ ॥ विशेष—इस मांगलिक श्लोक के द्वारा श्रीगोरक्षनाथजी ने आदिनाथ द्वारा शिवस्वरूप में अभिव्यक्त होकर अपनी अभिन्न आत्मविहारिणी परमेश्वरी पार्वती के प्रति सप्तशृङ्ग पर उपदिष्ट योगमहाज्ञान का संदर्भ प्रस्तुत कर महामति मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा उसका श्रवण निरूपित किया है तथा मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा अपने ( गोरखनाथ के ) प्रति उपदिष्ट का स्मरण दिलाया है । मत्स्येन्द्रनाथ ने इस शैव योग का प्रकाशन कर जगत् के प्राणियों का अज्ञान-अन्धकार नाश कर स्वसंवेद्य सिद्धामृत का सिद्धसिद्धान्त के रूप में अवतरण किया, इस सिद्धसिद्धान्त की पद्धति ( साधन-प्रक्रिया ) के रूप में गोरखनाथजी ने रचना की । शिव को शक्तियुक्त और जगद्गुरु के रूप में नमस्कार करने का यही स्वारस्य है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १