सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऔर पाँचवां गुण रोम ( बाल ) है। शरीर के रचनाक्रम में पृथ्वीतत्व के गुण के रूप में अस्थि, मांस, त्वचा, नाड़ी और रोम ही मुख्य हेतु हैं ॥ ३६ ॥ लाला मूत्रं शुक्रं शोणितं स्वेद इतिपञ्चगुणा आपः ॥ ४० ॥ भौतिक शरीर में स्थित जल तत्व के पाँच गुण लार, मूत्र, शुक्र, ( वीर्य ) शोणित ( रक्त ) और स्वेद पसीना हैं । जलीय द्रव्य के रूप में भौतिक शरीर की संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४० ॥ क्षुधा तृषा निद्रा कान्तिरालस्यमिति पञ्चगुणं तेजः ॥ ४१ ॥ भौतिक शरोर में तेज ( पावक—अग्नि ) तत्व के पाँच गुण क्षुधा, तृषा ( प्यास ) निद्रा, कान्ति और आलस्य हैं। तेज तत्व के रूप में भौतिक शरीर की संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४१ । विशेष—निद्रा को अग्नि तत्व का गुण इसलिये कहा गया है कि पेट भर भोजन करने के बाद पेट में गर्मी की अधिकता से पित्त नाड़ियों में व्याप्त होता है, मन का नाड़ियों में सञ्चार ( भ्रमण ) बन्द हो जाने से निद्रा आती है। इसी तरह नाड़ियों में पित्त के व्याप्त हो जाने पर आलस्य आता है। धावनं भ्रमणं प्रसारणमाकुञ्चनं निरोधनमिति पञ्च- गुणो वायुः ॥ ४२ ॥ भौतिक शरीर में वायु की स्थिति ही उसकी सजीवता अथवा प्राणमयता है। शरीर में स्थित वायु के पाँच गुण धावन (वेगपूर्वक संचरण), भ्रमण ( प्रत्येक नाड़ी में प्रवहन ), प्रसारण ( फैलना ), आकुञ्चन ( समेटना—स्वाभिमुख- संयोगानुकूल व्यापार और निरोध ( नियतदेशसंयोगानुकूल व्यापार ) हैं। शरीरस्थ वायु के ये पाँच गुण शरीर के जीवित रहने में मुख्य हेतु हैं ॥ ४२ ॥ रागो द्वेषो भयं लज्जा मोह इति पञ्चगुण आकाशः इति पञ्चविंशति गुणानां भूतानां पिण्डः ॥ ४३ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५