सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुभमशुभं यशोऽपिकीर्तिरदृष्टफलसाधनमिति पञ्चगुणं कर्म ॥ ६३ ॥ शरीर की उत्पत्ति के निमित्तकारणरूप कर्म पाँच प्रकार के होते हैं। पहला शुभ कर्म है। यज्ञादि कर्म तथा स्वर्गादि प्राप्त कराने वाले सत्कर्म ही शुभ कर्म हैं। अशुभ कर्म वे हैं, जो निन्दित और असत्य तथा पापप्रेरित हैं। इनसे नरक आदि की प्राप्ति होती है। पुण्यादि कर्म से यश बढ़ता है और अकर्म अपकीर्ति प्रदान करने वाले कर्म हैं। जिन कर्मों के फल चर्मचक्षु--इन्द्रियजन्य ज्ञान के अप्रत्यक्ष हैं, वे अदृष्टफलसाधन कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥ रतिः, प्रीतिः, क्रीड़ा, कामनाऽऽतुरतेति पञ्चगुणाः कामः ॥ ६४ ॥ विषय-भोग-सेवन-जन्य कर्म ही काम कहा जाता है। काम पाँच प्रकार का होता है। काम का पहला रूप रति है, स्त्री के प्रति रमणीयता की वृत्ति ही रति है। सुख-साधनों में अनुरक्ति ही प्रीति है। इन्द्रियों और मन को आनन्दित करने वाली रमणीय वस्तुओं को साधन बनाकर सुख-सम्पादन की क्रिया ही क्रीड़ा है, इस सम्बन्ध में नौका-विहार, कन्दुक उछालना आदि खेलों को दृष्टान्त रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। काम-सुख की प्राप्ति में निरन्तर स्पृहा रखना ही कामना है तथा भोग-सुख अथवा रमणीयता का आस्वादन शीघ्रातिशीघ्र हो, इस तरह की मनोवृत्ति ही आतुरता है ॥ ६४ ॥ उल्लोला, कल्लोलिनी,, उच्चलन्ती, उन्मादिनी, तरङ्गिणी शोषिणी, लम्पटा, प्रवृत्तिः, लहरी, लोला, लेलिहाना, प्रसरन्ती, प्रवाहा, सौम्या, प्रसन्नता, प्लवन्ती एवं चन्द्रस्य षोडशकला सप्तदशीकला निवृत्ति, साऽमृतकला ॥ ६५ ॥ चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं। भोगप्रवृत्ति को बढ़ानेवाली, द्रवित करने वाली कला उल्लोला है। बड़े आकार की तरंगमयी कला कल्लोलिनी है, ऊपर को चलनेवाली, प्रवृत्त होनेवाली उच्चलन्ती है। विषयसुख के प्रति मन को उन्मादित करने वाली कला उन्मादिनी है, तरंगायित होने वाली कला तरंगिणी है, जल और रस को सुखाने वाली कला शोषिणी है, लम्पटा चारों ओर फैलती सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २५