सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशो कला ज्योतिरिति प्रत्यक्षकरणगुणकला- समूहः ॥ ६७ ॥ अग्नि की दस कलायें हैं । दीपका कला दीप्त ( प्रकाशित ) करनेवाली कला है । राजिका कला शोभामयी करती है, ज्वाला कला ही ज्वालिनी है, विस्फुलिंग—चिनगारी प्रकट करनेवाली कला विस्फुलिंगिनी है । प्रचण्डकिरणों से युक्त कला ही प्रचण्डा है और जठरादि में भोज्य पदार्थों को पचानेवाली, वृक्षादि में फलों को रसमय करनेवाली कला ही पाचिका है । रौद्र स्वभाव की प्रतिपादिका कला रौद्रे है, जलाने वाली कला का नाम दाहिका है, रागिणी अग्नि की लाल ज्योति की प्रकाशिका है, ऊपर की ओर लौ धारण करनेवाली कला शिखावती है । अग्नि की निजकला ज्योति है । ( सूर्य, चन्द्र और अग्नि—शिव के त्रिनेत्र के वाचक हैं । ) इस तरह प्रत्यक्षकरणपंचक के गुण-समूह और कलाओं का वर्णन किया गया है ॥ ६७ ॥ दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान ग्रथ नाड़ीनां दश द्वाराणि । इडापिङ्गला नासाद्वारयोर्वहतः सुषुम्णा नाडी तु ब्रह्मदण्डमार्गेण ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं वहति सरस्वती मुखद्वारे वहति पूषाऽलम्बुषा चक्षुर्द्वारयोर्वहतो गान्धारी हस्ति- जिह्विका च कर्णद्वारयोर्वहतः कुहूर्गुदाद्वारे वहति शंखिनी लिङ्गद्वारे वहति एवं दशद्वारेषु वहन्ति ॥ ६८ ॥ शरीर में ( प्राणवाहिनी ) दस ( प्रमुख ) नाड़ियों के दस द्वारों का वर्णन किया जाता है । नासिका के दोनों रन्ध्र ( द्वार ) से—बायें से इडा और दायें से पिंगला बहती है । सुषुम्णा नाड़ी ब्रह्मदण्डमार्ग ( मेरुदण्ड ) से ब्रह्मरन्ध्र तक बहती है और सरस्वती मुख-द्वार में बहती है । चक्षुद्वार—बायें नेत्र में गान्धारी और दक्षिण नेत्र में हस्तिजिह्विका नाड़ी बहती हैं, कानों के द्वार में— यथाक्रम पूषा और अलम्बुषा बहती हैं । शंखिनी नाड़ी लिंग द्वार में बहती है और गुदा द्वार में मूल नाड़ी बहती है । दसों द्वारों में दसों नाड़ियाँ बहती हैं ॥ ६८ ॥ सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २७