भारतकोश
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

'कांठे चक्रे धरिये ध्यान । ( मच्छोन्द्रगोरखवोध-५४ ) यह कण्ठचक्र सुनहले रंग का है। यह बड़ा तेजस्वी और सोलहस्वरों ( अक्षरों ) से समलंकृत है । इस कमल में सोलह दल हैं और उन पर यथाक्रम- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः —स्वर अंकित हैं । इस चक्र की अधिष्ठात्री शाकिनो है और इष्ट देवता अर्धनारीश्वर शिव हैं । कण्ठस्थानस्थितं पद्म विशुद्ध नाम पञ्चमम् । सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम् । ( शिवसंहिता ५ । ११६ ) जो इस कंठचक्र का ध्यान करता है, वह योगीश्वर हो जाता है, चारों वेद का ज्ञानी हो जाता है, इस विशुद्ध चक्र में मन और प्राण का लय होने पर योगी यदि क्रोध करता है तो तीनों लोक भय से कांप उठते हैं। इसका ध्यान कर योगी लम्बी अवधि के लिये वाह्य ज्ञान से शून्य होकर समाधिस्थ हो जाता है । इस चक्र में