सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका मान हो जाता है । और चतुर्भुज की शेष दोनों भुजाएँ त्रिभुज की भुजाएँ बन जाती हैं । दूसरा संकुचित कर्ण चतुर्भुज के लम्ब से कम नहीं होगा और वे दोनों भुजाएँ आधार से बड़ी नहीं होगी । इस कथन के अनुसार ५६ की जगह पर कर्ण के ३२ मानने से इसी चतुर्भुज का दूसरा कर्ण ७६ २२/२५ आता है । (सामने चित्र देखिये) (२) इसी क्षेत्र को समलम्ब चतु- भुज की स्थिति में रखने से ६० - २५ = ३५ को आधार मानकर, अन्तर्लम्ब त्रिभुज के स्वरूप में ३५ आधार के दो विभागों में एक विभाग का मान ३/५ और दूसरे विभाग का मान १७२/५ होता है । तथा शीर्षकोण से आधार तक लम्ब का मान √(३८०१६ / २५) आता है । आसन्नमूल लेने से लम्ब का मान ३८ २४/२५ आता है । √{(६० - ३/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ७१ १/१८ तथा √{(६० - १७२/५)² + ३८०१६/२५} आसन्न मूल ४६ २/३ यह द्वितीय कर्ण होता है ।