सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) भास्कराचार्य के पूर्ववर्ती श्री लल्लाचार्य ने वृत्तफल गुणित व्यास को गोल का पृष्ठ- फल कहा है । गणित की इस महान त्रुटि पर भास्कराचार्य ने गोलाध्याय में बहुत विशद् वर्णन के साथ गोलपृष्ठफल का सूक्ष्म गणित बताया है । उदाहरणतः—किसी वृत्त के व्यास का मान ७ है, उस वृत्त का वृत्तक्षेत्रफल उसका पृष्ठफल और उसी वृत्त का घनफल क्या होगा ? ७ × ३९२७ यतः व्यास = ७ अतः ------------ = वृत्त की परिधि होती है । १२५० परिधि × व्यास ७ × ७ × ३९२७ २४२३ ------------------ = वृत्तफल = ------------------ = ३८--------- । वृत्तफल × ४ = ४ १२५० × ४ ५००० ७ × ३९२७ × ४ × ७ ११७३ कन्दुक जाल की तरह गोलपृष्ठफल = -------------------------- = १५३ = -------- १२५० × ४ १२५० गोलपृष्ठफल × ७ ७ × ३९२७ × ७ × ४ ७ × ३९२७ × ७×४×७ -------------------- = गोलघनफल = ---------------------- = ---------------------------- ६ १२५० × ४ × ६ १२५० × ४ × ६ १३४६९६१ १४८७ = ------------ = १७९ ------------ यह गोल का घनफल हो जाता है । ७५०० २५०० भास्कराचार्य ने किसी वृत्त के ज्या और उत्क्रमज्या = जिसे शर या बाण भी कहते हैं जानने का भी सरल गणित किया है । किसी वृत्त का व्यास = १० और उसमें जीवा = ज्या = ६ है तो उसमें शर क्या होगा ? इसका हल १० ± ६ = १६ × ४ = √६४ = ८ १० - १ = ९, ९ × १ = ९ का मूल = ३, ३ × २ = ६ जीवा हो जाती है । / जीवा \² विलोम गणित से जीवा और व्यास को जानकर ( ------- ) = ९ ÷ १ = ९, ९ + १ = १० \ २ / = व्यास मान स्पष्ट होता है । तथा किसी २००० व्यासमान के वृत्तान्तर्गत समभुज त्रिभुज से समनवभुज क्षेत्र तक की भुजाओं के ज्ञान के लिए, वृत्त के व्यास को क्रमशः १०३९२३······८४८५३······४१०३१ गुणाकर १२०००० से भाग देने पर उक्त त्रिगुणादि नवभुजान्त क्षेत्र की प्रत्येक भुजा ज्ञात हो जाती है । लीलावती में अंकजाल या अंकपाश गणित अङ्कपाश को अंकजाल के रूप में भी निर्देशित किया जा सकता है । आधुनिक विक- सित गणित में इस गणित का महत्वपूर्ण स्थान है । १ से लेकर ९ संख्या तक के अङ्कों के विभिन्न स्थानों से उनके भेद, उनके योग आदि का ज्ञान करने के अध्याय को भास्कराचार्य ने अङ्कपाशाध्याय जिसे अङ्कों के जाल का अध्याय कहा है । उदाहरण से भी अनन्तरूपी भगवान विष्णु का एक सीमित रूप चतुर्भुज (चतुर्बाहु) भी है ।