सिद्धान्तशिरोमणि: गोलाध्याय (भास्कराचार्य - मरीचि भाष्य एवं पं. केदारदत्त जोशी सविस्तार व्याख्या)
Siddhanta Shiromani Goladhyaya with Marichi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (भाष्यकार: मुनीश्वर / केदारदत्त जोशी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभुवनकोशः ६५ अतल, वितल, नितल, गभस्ति, महीतल, सुतल और पातालादि सप्तलोक इसी पृथ्वीपुर में स्थित हैं । इन पातालादि लोकों में असुर गणों के साथ अपने देदीप्यमान मणियों से प्रकाशित वासुकि प्रमुख सर्पगणों का समूह आवास करता है । मेरु में ६ मास के मानव मान के १ दिन में, सम्भोग इच्छा की उत्पत्ति से मेरु- पृष्ठस्थ देवता स्वर्गाङ्गनाओं के साथ क्रीडा नृत्यादिरति में प्रवृत्त होते हैं । तथा भूगोल के दक्षिण दिग्भाग में दो-दो समुद्रों के मध्य में अन्य शाकशाल्मल्यादि सातद्वीप पृथ्वीपुटों में संस्थित हैं । अर्थात् क्षार और क्षीर समुद्र के मध्य में शाक संज्ञक द्वीप, क्षीर और दधि समुद्र के मध्य में शाल्मल नामक द्वीप, दही और घी समुद्र के मध्य में कौशद्वीप, घी और इक्षुरस समुद्र के मध्य में क्रौञ्च द्वीप, इक्षुरस और मद्य समुद्रों के मध्य में पुष्कर द्वीप संस्थित है । अर्थात् उक्त दो-दो समुद्रों के मध्य में उक्तशाकादि सप्तद्वीप स्थित हैं । २१।।२२।। २३।।२४।।२५।। इदानीं जम्बूद्वीपमध्ये गिरिनिवेशवशेन नव खण्डान्याह— लङ्कादेशाद्धिमगिरिरुदग्धेमकूटोऽथ तस्मा- तस्माच्चान्यो निषध इति ते सिन्धुपर्यन्तदैर्ध्याः । एवं सिद्धादुदगपि पुराच्छृङ्गवच्छुक्लनीला वर्षाण्येषां जगुरिह बुधा अन्तरे द्रोणिदेशान् ॥२६॥ भारतवर्षमिदं ह्युदगस्मात्किन्नरवर्षमतो हरिवर्षम् । सिद्धपुराच्च तथा कुरु तस्माद्विद्धि हिरण्मयरम्यकवर्षे ॥२७॥ माल्यवांश्च यमकोटिपत्तनाद्रोमकाच्च किल गन्धमादनः । नीलशैलनिषधावधी च तावन्तरालमनयोरिलावृतम् ॥२८॥ माल्यवज्जलधिमध्यवर्ति यत्तत्तु भद्रतुरगं जगुर्बुधाः । गन्धशैलजलराशिमध्यगं केतुमालकमिलाकलाविदः ॥२९॥ निषधनीलसुगन्धसुमाल्यकैरलमिलावृतमावृतमाबभौ । अमरकेलिकुलाथसमाकुलं रुचिरकाञ्चनचित्रमहीतलम् ॥३०॥ वा० भा०—अत्र भूगोलस्यार्धमुत्तरं जम्बूद्वीपम् । तस्य क्षारोब्धेश्च संधि- निरक्षदेशः । तत्र लङ्का रोमकं सिद्धपुरं यमकोटिरिति पुरचतुष्टयं भूपरिधिचतुर्था- ५